पानीपत :- पानीपत आज हथकरघा (हैंडलूम) दिवस है। आजादी के बाद पाकिस्तान से आए लोगों की मेहनत से पानीपत हैंडलूम नगर बना। पाकिस्तान के हैदराबाद से आए उस्ताद नंदलाल को यह श्रेय जाता है। जिसे अमृतलाल बत्तरा और मदन मोहन महाजन आदि ने नई ऊंचाइयां दी। बीते 75 सालों में पावरलूम और शटलस लूम तक आ गई। लेकिन, हैंडलूम के प्रॉडक्ट आज भी ज्यादा पावरफुल बने हुए हैं। एक्सपोर्टर व यंग एंटरप्रन्योर सोसायटी के चेयरमैन रमन छाबड़ा ने कहा कि हथकरघा पर बने चादर, कुशन कवर, बाथरग, पुफ (बैठने वाला) की कीमत आज भी मशीन से बने प्रॉडक्ट से ज्यादा हैं। छाबड़ा ने कहा कि अमृतलाल बत्तरा पहले व्यक्ति थे, जिसने 1970 में अमेरिका में पहली बार पानीपत के हैंडलूम प्रॉडक्ट की शिपमेंट भेजी।
दुनिया को इसके बाद पानीपत के हथकरघा उद्योग के बारे में पता चला। जिसे मदन मोहन महाजन ने व्यापक रूप दिया। आज भी 20 हजार करोड़ के एक्सपोर्ट में 30 से 40 फीसदी हिस्सेदारी हथकरघा उद्योग की है। आज पानीपत में हैंडलूम व पावरलूम आदि से बने टेक्सटाइल का कारोबार 125 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। पाकिस्तान के मुलतान की मियांवाली के लोग खेस (ओढ़ने वाला) बनाने में माहिर थे। सरकार ने इन लोगों को यहां कच्चा कैंप पानीपत में बसाया। घर दिया, हैंडलूम दिए और लगाने के लिए पैसे। पानीपत की महिलाएं उस वक्त घरों के उपयोग के लिए पुराने कपड़े की दरी बनाती थी।
दरी, चादर बनाने वाले मियांवाली से आए लोगों ने दरी की रूपरेखा ही बदल दी। 1975 में पानीपत में बुनकर सेवा केंद्र स्थापित किया गया। तब से लेकर 1998 तक मैं पानीपत में इस केंद्र में रहा। मुलतान से आए लोगों ने अपनी मेहनत से पानीपत को हैंडलूम नगर बनाया। -बुनकर सेवा केंद्र, पानीपत के प्रमुख रहे खेमराज सुंदरयाल, राष्ट्रीय हैंडलूम अवॉर्डी, उत्तराखंड निवासी
^मिट्टी खोदकर पिटलूम चलाने का ट्रेंड तो अब पानीपत में रेयर हो गया है। अब जमीन के ऊपर फ्रेमलूम चल रहा। दोनों हैंडलूम हैं। हाथ से बने प्रॉडक्ट का कोई तोड़ नहीं। हाथ से बने कुशन कवर 4 रुपए डॉलर में बिकता है, वहीं मशीन से बना कुशन कवर डेढ़ से दो डॉलर में बिक रहा। हमारी हथकरघा से बनी दरी की मांग सबसे अधिक है। यहीं पानीपत का ब्रांड है। -एक्सपोर्टर व यस के चेयरमैन, रमन छाबड़ा



