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हरियाणा में इस बार BJP का क्लीन स्वीप बहुत मुश्किल: 10 में से 8 सीटों पर भाजपा मजबूत; कांग्रेस को 2 लोकसभा क्षेत्रों में बढ़त की संभावना

हरियाणा में लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही माहौल गर्माने लगा है। राज्य की सभी 10 सीटों पर 25 मई को एक साथ मतदान होगा। गांवों में किसान गेहूं काट-बेचकर फ्री हो चुके हैं। ऐसे में अगले कुछ हफ्तों के दौरान मौसम के साथ-साथ सियासी पारा भी चढ़ना तय है।

प्रदेश में इस बार भी मुख्य मुकाबला BJP और कांग्रेस में है। ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो और उनके पोते दुष्यंत चौटाला की पार्टी JJP मैदान में तो है, लेकिन उनकी उपस्थिति कांग्रेस व भाजपा के मुकाबले को रोचक ही बना रही है।

अगर पार्टियों के लिहाज से देखा जाए तो BJP के नेता 2019 का प्रदर्शन दोहराने का दम भर रहे हैं। तब बीजेपी ने क्लीन स्वीप करते हुए, राज्य की सभी 10 सीटें अपनी झोली में डाली थीं। इस बार भी तैयारियों के मामले में भगवा पार्टी अन्य सियासी दलों के मुकाबले आगे दिखती है।

उसने अपने सभी उम्मीदवारों का ऐलान 25 मार्च 2024 को ही कर दिया था। राज्य में टिकटों का ऐलान सबसे पहले BJP ने ही किया और महीनेभर से उसके कैंडिडेट्स फील्ड में एक्टिव हैं।

वहीं मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही कांग्रेस पिछले दो चुनाव के प्रदर्शन को भुलाकर आगे बढ़ने की कोशिश में है। उसकी तैयारियां भी 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतर दिख रही हैं मगर नेताओं की आपसी गुटबाजी पार्टी पर हावी है। नौबत यहां तक पहुंच गई कि टिकटों के ऐलान से पहले हाईकमान को कई दौर की मीटिंग्स करनी पड़ गईं।

फिलहाल पार्टी 10 में से 8 सीटों पर प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर चुकी है। गुरुग्राम सीट पर पेंच अभी तक फंसा है। भाजपा विरोधी दलों के I.N.D.I.A. अलायंस में शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) को कांग्रेस ने कुरुक्षेत्र सीट दी है जहां से AAP के प्रदेशाध्यक्ष सुशील गुप्ता खुद चुनाव मैदान में उतरे हैं।

कांग्रेस 2014 की मोदी लहर के दौरान हरियाणा में सिर्फ रोहतक सीट जीत पाई थी। 2019 में कांग्रेस ने ये इकलौती सीट भी गंवा दी। ऐसे में उसके नेताओं पर इस बार बेहतर प्रदर्शन का दबाव है। एक-आध सीट को छोड़ दिया जाए तो टिकटों का बंटवारा भी काफी हद तक सही कहा जा सकता है।

सीटवाइज पार्टियों की स्थिति
वोटिंग से महीनेभर पहले दक्षिण हरियाणा की गुरुग्राम-फरीदाबाद और जीटी रोड बेल्ट की करनाल-कुरुक्षेत्र सीट पर BJP अच्छी स्थिति में दिख रही है। इनेलो में टूट, JJP में बिखराव और बिश्नोई-जिंदल परिवार का साथ मिलने से हिसार में भी BJP के रणजीत चौटाला फिलहाल ठीक पोजीशन में नजर आते हैं।

इसके उलट सिरसा, सोनीपत और रोहतक सीट पर अभी तक कांग्रेस को शुरुआती एज नजर आता है, लेकिन महीनेभर में हालात बदलने से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

भिवानी-महेंद्रगढ़ में कांग्रेस-भाजपा का प्रदर्शन काफी हद तक किरण चौधरी के रुख पर निर्भर करेगा। यहां राव दानसिंह को टिकट मिलने के बाद किरण ने अपने समर्थकों की भिवानी में बैठक बुलाकर दानसिंह का साथ देने की बात कही लेकिन इसी बैठक में उनकी बेटी श्रुति चौधरी के आंसू कुछ अलग सियासी संदेश देते नजर आए। अब कार्यकर्ता श्रुति चौधरी के आंसुओं पर जाते हैं या किरण चौधरी के ऐलान पर, ये देखना होगा। इससे ही भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार राव दानसिंह की मजबूती या कमजोरी तय होगी।

अंबाला की बात करें तो यहां बाजी कोई भी पार्टी मार सकती है। BJP की उम्मीदवार बंतो कटारिया का ये पहला इलेक्शन है । उन्हें अपने पति रतनलाल कटारिया के निधन के बाद सहानुभूति लहर की उम्मीद है। उनके सामने उतरे कांग्रेस के वरुण मुलाना का भी यह पहला लोकसभा चुनाव है।

फरीदाबाद : 2 कट्‌टर प्रतिद्वंद्वी 20 साल बाद फिर आमने-सामने
दिल्ली और यूपी से लगती फरीदाबाद सीट पर इस बार 2 पुराने प्रतिद्वंद्वियों के आमने-सामने आ जाने से मुकाबला रोचक बन गया है। यहां BJP के कृष्णपाल गुर्जर और कांग्रेस के महेंद्र प्रताप सिंह 20 साल बाद चुनावी रण में फिर एक बार आमने-सामने हैं।

दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के सामने विधानसभा चुनाव तो कई दफा लड़ा लेकिन लोकसभा की सीट के लिए उनमें यह पहली भिड़ंत होगी। इससे पहले वर्ष 2004 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में कृष्णपाल गुर्जर और महेंद्र प्रताप सिंह ने उस समय की मेवला महाराजपुर सीट पर एक-दूसरे के सामने चुनाव लड़ा था और तब 63 हजार वोटों के अंतर से बाजी महेंद्र प्रताप ने मारी थी। अब गुर्जर उस हार का बदला लेना चाहेंगे।

गुर्जर को महीनेभर पहले टिकट मिलने का एडवांटेज
फरीदाबाद सीट पर गुर्जर को 10 साल की एंटी इनकंबेंसी के साथ-साथ अपनी पार्टी के कुछ नेताओं के विरोध से भी जूझना पड़ रहा है। ये नेता खुलकर तो कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन अंदरखाते गुर्जर का खेल बिगाड़ने की जुगत में लगे हैं। हालांकि एक महीने पहले टिकट घोषित हो जाने के बाद गुर्जर को तैयारी के लिए काफी समय मिल गया। महीनेभर में वह पार्टी के नाराज नेताओं में से ज्यादातर को साथ लाने में कामयाब हो चुके हैं। हालांकि इनमें से कितने मन से उनके साथ चल रहे हैं, ये कहना थोड़ा मुश्किल है।

महेंद्र प्रताप को हुड्‌डा ने मनाया चुनाव लड़ने के लिए
कांग्रेस ने फरीदाबाद से महेंद्र प्रताप सिंह की उम्मीदवारी की घोषणा 3 दिन पहले की। उन्होंने नौ बार विधानसभा चुनाव लड़ा और 5 बार विजयी रहे। वर्ष 1966 में महज 21 साल की उम्र में अपने गांव नवादा कोह के सरपंच बनने वाले महेंद्र प्रताप जमीन से उठे राजनेता हैं। उन्होंने वर्ष 2019 में ही सक्रिय चुनावी राजनीति से संन्यास लेते हुए बेटे विजय प्रताप सिंह को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी थी। अब भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए राजी किया।

वर्ष 1982 में मेवला महाराजपुर विधानसभा सीट से पहली बार MLA बने महेंद्र प्रताप ने उसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1987 में जब हरियाणा में ताऊ देवीलाल के न्याय युद्ध की आंधी चल रही थी, तब भी महेंद्र प्रताप ने विधानसभा चुनाव नहीं हारा। उस समय पूरे हरियाणा में कांग्रेस के सिर्फ 5 विधायक जीते थे और उनमें से एक महेंद्र प्रताप थे। वह भजनलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे।

करण दलाल बिगाड़ सकते हैं खेल, गुर्जर की राह आसान नहीं
कांग्रेस में फरीदाबाद सीट से टिकट की दौड़ में करण सिंह दलाल भी थे। दलाल पूर्व CM भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा के समधी हैं और टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं। वह आगे का फैसला लेने के लिए अपने समर्थकों की मीटिंग बुला चुके हैं। अगर दलाल चुनावी रण में उतरे तो कांग्रेस के वोट बंटने का फायदा BJP को मिल सकता है।

2019 के लोकसभा चुनाव में फरीदाबाद सीट पर कृष्णपाल गुर्जर को 9 लाख 13 हजार 222 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना को 6 लाख 38 हजार 239 वोटों के अंतर से हराया। विनिंग मार्जिन के हिसाब से यह देशभर में तीसरी सबसे बड़ी जीत थी। इस बार गुर्जर के लिए इसे दोहरा पाना मुश्किल रहेगा।

सिरसा के समर में कांग्रेस के दो पुराने प्रदेशाध्यक्ष आमने-सामने
सिरसा लोकसभा सीट पर कांग्रेस पार्टी के दो पुराने प्रदेशाध्यक्ष आमने-सामने हैं। कांग्रेस ने यहां कुमारी सैलजा को टिकट दिया है जबकि BJP ने अशोक तंवर को उम्मीदवार बनाया है। अशोक तंवर को किसी समय हरियाणा में कांग्रेस के फ्यूचर लीडर के तौर पर देखा जाता था लेकिन बाद में वह हाशिये पर चले गए। पूर्व CM भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा से अनबन के चलते 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होने कांग्रेस छोड़ दी और 5 बरसों में तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से होते हुए अब BJP में पहुंच चुके हैं।

दूसरी ओर सिरसा के सियासी समर में सैलजा की 26 साल बाद वापसी हुई है। 1991 और 1996 में सिरसा सीट से सांसद रह चुकीं सैलजा 1998 का लोकसभा चुनाव डॉ. सुशील इंदौरा से हारने के बाद अंबाला चली गई थीं। 1996 के बाद अब वह सांसद का चुनाव लड़ने सिरसा लौटी हैं।

BJP ने कमजोर स्थिति को भांपकर चेहरा बदला
BJP ने 2019 के लोकसभा चुनाव में सुनीता दुग्गल को चुनावी मैदान में उतारा था जिन्होंने उस समय के कांग्रेसी कैंडिडेट अशोक तंवर को हराकर इस सीट पर पहली बार कमल खिलाया। तब सुनीता दुग्‍गल को 7 लाख 14 हजार 351 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के तंवर को 3 लाख 9 हजार 918 वोट से हराया। अब पांच साल बाद, सुनीता दुग्गल चुनावी सीन से बाहर हो चुकी हैं और BJP में उनकी जगह अशोक तंवर ले चुके हैं।

दरअसल पिछले 5 बरसों में बतौर सांसद सुनीता दुग्गल की परफॉर्मेंस ठीक नहीं रही। किसान आंदोलन और किसानों से जुड़ी अपनी कुछ टिप्पणियों के चलते वह विवादों में रहीं। BJP ने लोकसभा टिकटों के ऐलान से लगभग 6 महीने पहले हरियाणा में जो इंटरनल सर्वे करवाए थे, उसमें सिरसा सीट पर पार्टी की स्थिति काफी कमजोर बताई गई। उसके बाद BJP ने सुनीता दुग्गल का टिकट काटने का फैसला लेते हुए अशोक तंवर की पार्टी में एंट्री करवाई।

सैलजा का नाम टिकट के लिए कांग्रेस के सर्वे में सबसे ऊपर
दूसरी ओर, कांग्रेस ने सिरसा सीट से पार्टी कैंडिडेट्स को लेकर जो सर्वे करवाया, उसमें सैलजा का नाम पहले नंबर पर आया। हालांकि शुरू में सैलजा लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। उनकी इच्छा 6 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उतरने की थी लेकिन पार्टी हाईकमान ने उन्हें राजी कर लिया।

सैलजा पिछले कुछ बरसों के दौरान सिरसा में ज्यादा एक्टिव नहीं रहीं। इस संसदीय हलके में कांग्रेस के अंदर गुटबाजी भी हावी है। यहां टिकट दावेदारों में शामिल रहे डॉ. सुशील इंदौरा हुड्‌डा गुट से ताल्लुक रखते हैं। अशोक तंवर भी पुराने कांग्रेसी हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस के वोट बंटे तो उसका फायदा BJP को मिलेगा।

गुरुग्राम : अभी तक BJP के लिए सबसे सेफ सीट, कांग्रेस के कैंडिडेट का इंतजार
दिल्ली से लगती गुरुग्राम लोकसभा सीट पर आज की तारीख में BJP की स्थिति कांग्रेस के मुकाबले अच्छी दिख रही है। राव इंद्रजीत इस सीट से लगातार 3 लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और BJP ने उन्हें फिर से टिकट दी है। कांग्रेस ने अभी तक उनके सामने अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है।

गुरुग्राम संसदीय हलके में गुरुग्राम जिले की 4 विधानसभा सीटों के अलावा नूंह जिले की 3 और रेवाड़ी जिले की 2 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां सबसे ज्यादा अहीर वोटर हैं जिनकी तादाद तकरीबन साढ़े 3 लाख है। दूसरे नंबर पर मुस्लिम वोटर हैं जो लगभग 3 लाख 10 हजार के आसपास हैं। इनके अलावा ढाई लाख SC, 1 लाख 45 हजार पंजाबी और 1 लाख 35 हजार के आसपास जाट वोटर हैं।

राव इंद्रजीत को अपनी साख और मोदी के चेहरे का फायदा
अहीर वोटरों पर राव इंद्रजीत की अच्छी पकड़ है। BJP को यहां PM नरेंद्र मोदी के चेहरे और राममंदिर निर्माण का भी फायदा मिलने की उम्मीद है। मुस्लिम बाहुल्य नूंह में कुछ हद तक राव इंद्रजीत का अपना प्रभाव है। नूंह हिंसा के बाद राव इंद्रजीत उन चंद नेताओं में शामिल थे जिन्होंने हिंदू संगठनों की ब्रजमंडल यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के पास हथियारों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए थे।

2014-2019 में नूंह में कांग्रेस को बढ़त
नूंह जिला मुस्लिम बाहुल्य है और जुलाई 2023 में हुई हिंसा के बाद यहां BJP को लेकर वोटरों में नाराजगी है। वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी नूंह जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को बढ़त मिली थी। इस बार भी यहां कांग्रेस आगे रह सकती है।

हालांकि गुरुग्राम, रेवाड़ी, बादशाहपुर और पटौदी में माहौल बीजेपी की तरफ नजर आता है। ऐसे में वोटों के ध्रुवीकरण, मोदी के चेहरे और राम मंदिर का फायदा BJP को मिलता दिख रहा है।

हिसार : इस बार रोचक समीकरण, भजनलाल-बीरेंद्र सिंह का परिवार ‘आउट’
हरियाणा की बागड़ बेल्ट में आने वाली हिसार लोकसभा सीट पर कई रोचक समीकरण देखने को मिल रहे हैं। इस बार भजनलाल फैमिली न सिर्फ चुनावी महासमर से बाहर बैठी है बल्कि अपने कट्‌टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, चौटाला परिवार के एक मेंबर के लिए वोट मांगने को मजबूर भी है। देवरानी-जेठानी और ससुर-बहू एक-दूसरे के सामने ताल ठोंक रहे हैं। बीरेंद्र सिंह का परिवार भी चुनावी समर से आउट है।

ताऊ देवीलाल का नाम भुनाने की कोशिश में
BJP ने इस इलाके में पूर्व उपप्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल के रसूख को भुनाने के मकसद से उनके बेटे रणजीत चौटाला को उम्मीदवार बनाया है। रणजीत चौटाला का मुकाबला अपने ही 2 भतीजों की पत्नियों से है। पूर्व CM ओपी चौटाला की पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने यहां से ओपी चौटाला के सबसे छोटे भाई प्रताप चौटाला के बेटे रवि की पत्नी सुनैना को टिकट दिया है वहीं ओपी चौटाला के बड़े बेटे डॉ. अजय चौटाला की जननायक जनता पार्टी (JJP) ने यहां से नैना चौटाला को उम्मीदवार बनाया है।

जेपी चाहेंगे हार का सिलसिला खत्म करना
कांग्रेस का टिकट पाने वाले 70 वर्षीय जयप्रकाश जेपी हिसार लोकसभा सीट से कुल 7 बार चुनाव लड़ चुके हैं। इनमें से 3 बार वह जीते और 4 बार हारे। यह उनका 8वां लोकसभा चुनाव है। हुड्‌डा गुट से ताल्लुक रखने वाले जेपी जानते हैं कि उनके लिए BJP से ज्यादा बड़ी चुनौती कांग्रेस के सभी धड़ों का साथ हासिल करना है। इस लोकसभा सीट पर किसान कई जगह BJP उम्मीदवार रणजीत चौटाला का विरोध कर चुके हैं। ऐसे में किसान आंदोलन के दौरान किसानों के पक्ष में खड़े होने का फायदा जेपी को मिल सकता है।

BJP के सामने जाटों को जोड़े रखने का टास्क
BJP इस जाट बाहुल्य सीट पर जाट और गैरजाट वोटरों को साधने का प्रयास कर रही है। 2019 में उसने यही काम सफलतापूर्वक किया और तब उसे हिसार में एकतरफा जीत मिली। उस समय BJP ने सर छोटूराम के नाती और हरियाणा के बड़े नेता बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह को टिकट दिया था। अब बीरेंद्र सिंह और उनके बेटे BJP छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। बृजेंद्र सिंह यहां से टिकट मांग रहे थे लेकिन कांग्रेस ने उनकी जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश जेपी पर दांव लगाया है। ऐसे में बीरेंद्र सिंह के परिवार की भूमिका कांग्रेस के लिए काफी अहम रहेगी।

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उधर जिंदल फैमिली कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ आ चुकी है। यहां इनेलो और JJP जाट वोटबैंक में जो सेंध लगाएंगे, उसका सीधा फायदा BJP को मिलेगा।

भिवानी-महेंद्रगढ़ : किरण चौधरी के लिए चौधर बचाने की लड़ाई
हरियाणा के दक्षिणी छोर की सबसे अहम लोकसभा सीट मानी जाती भिवानी-महेंद्रगढ़ में इस बार 2014 और 2019 से बिल्कुल अलग स्थिति है। BJP ने यहां अपने 2 बार के सांसद चौधरी धर्मबीर सिंह पर ही भरोसा जताया है वहीं कांग्रेस ने इस दफा बंसीलाल परिवार की बजाय अहीरवाल से ताल्लुक रखने वाले राव दानसिंह को मैदान में उतारा है।

इस बार चुनाव में एक और बदलाव हुआ है। यह पहला मौका है जब लोकसभा चुनाव से जुड़ी सारी प्रशासनिक गतिविधियां भिवानी की जगह महेंद्रगढ़ से संचालित हो रही हैं। इसकी वजह से भिवानी जिले के मतदाताओं में नाराजगी देखने को मिल रही है। इस बदलाव को कहीं न कहीं चौधर छिनने के तौर पर देखा जा रहा है।

किरण के सामने परिवार की चौधर बचाए रखने की चुनौती
भिवानी का इलाका बंसीलाल परिवार का गढ़ रहा है। इस बार भी उनकी पोती श्रुति चौधरी यहां से टिकट की दावेदार थीं लेकिन 2014 व 2019 में मिली बैक-टू-बैक हार के बाद कांग्रेस बंसीलाल परिवार से बाहर जाकर कैंडिडेट तलाशने को मजबूर हो गई। हालांकि श्रुति की मां और हरियाणा की पूर्व कैबिनेट मंत्री किरण चौधरी ने अपनी बेटी के लिए पुरजोर लॉबिंग की मगर कामयाबी नहीं मिली।

बेटी का टिकट कटने के बाद किरण चौधरी ने पार्टी का हुकुम मानने की बात तो कही लेकिन उनके तेवर कुछ अलग ही इशारा कर रहे हैं।

कांग्रेस की अहीर वोटरों को साधने की कोशिश
भिवानी-महेंद्रगढ़ संसदीय हलके में सबसे ज्यादा जाट और अहीर वोटर हैं। महेंद्रगढ़ के मौजूदा MLA राव दानसिंह के मैदान में आने से यहां मुकाबला रोचक हो गया है। दरअसल चौधरी धर्मबीर और श्रुति चौधरी, दोनों जाट कम्युनिटी से हैं और 2014 व 2019 में उनके आमने-सामने होने का सीधा फायदा BJP को मिला क्योंकि ज्यादातर अहीर वोटर उसके पक्ष में चले गए। अब राव दानसिंह के मैदान में आने से अहीर वोटरों का झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है। हालांकि यहां JJP के उम्मीदवार राव बहादुर सिंह भी अहीर हैं और वह जो वोट लेंगे, उसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा।

BJP का गांवों में विरोध, मोदी मैजिक से आस
भाजपा को यहां भी 10 साल की एंटी इनकंबेंसी के अलावा कई जगह किसानों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। कई गांवों में BJP नेताओं और पार्टी कैंडिडेट चौधरी धर्मबीर का विरोध हो चुका है।

भाजपा के लिए प्लस प्वाइंट ये है कि इस सीट पर जाटों के अच्छे-खासे वोट हैं और चुनावी मैदान में धर्मबीर के अलावा इस बिरादरी का कोई और उम्मीदवार नहीं है। पार्टी को जाट वोटबैंक के साथ-साथ मोदी मैजिक से आस है। अभी तक की स्थिति में यहां BJP को अपरहैंड नजर आ रहा है।

करनाल : खट्‌टर के सामने विनिंग मार्जिन बढ़ाने का चैलेंज
करनाल लोकसभा सीट से BJP ने पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर को टिकट दिया है। इस संसदीय सीट पर कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं था इसलिए उसने मनोहर लाल के सामने हरियाणा यूथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष दिव्यांशु बुद्धिराजा को उतारा है।

करनाल हलके में मराठा बिरादरी के अच्छे-खासे वोट हैं और वीरेंद्र वर्मा मराठा यहां शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के उम्मीदवार के तौर पर नामांकन करने जा रहे हैं। यूं तो कांग्रेस और NCP इंडिया अलायंस में एक साथ है लेकिन करनाल में यह दोनों पार्टियां आमने-सामने होंगी। ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी, इनेलो मराठा को समर्थन देने का ऐलान कर चुकी है।

जातीय समीकरणों की बात करें तो यहां पंजाबी, जाट, ब्राह्मण, रोड़, जटसिख और राजपूत बिरादरी के वोट ज्यादा हैं। BJP नायब सिंह सैनी को CM बनाकर ओबीसी कार्ड खेल चुकी है। इसके अलावा खट्‌टर खुद पंजाबी बिरादरी से हैं।

भाटिया ने अकेले लिए 70% से ज्यादा वोट, अब मनोहर पर नजर
2019 के चुनाव में भाजपा ने देशभर में सबसे बड़े मार्जिन से जो 10 सीटें जीती थीं, उनमें गुजरात की नवसारी के बाद करनाल सीट दूसरे नंबर पर थी। नवसारी में BJP के सीआर पाटिल ने 6 लाख 89 हजार 668 वोटों से कांग्रेस के धर्मेश पटेल को हराया था जबकि करनाल में BJP के संजय भाटिया ने कांग्रेस के कुलदीप शर्मा को 6 लाख 56 हजार 142 वोटों से पटखनी दी। तब संजय भाटिया ने यहां 70% से ज्यादा वोट लिए थे। इस बार मनोहर लाल के सामने इस विनिंग मार्जिन को बढ़ाने की चुनौती है। विनिंग मार्जिन घटने को भी विपक्ष BJP की लोकप्रियता घटने के तौर पर ही पेश करेगा।

भाजपा का फोकस फिलहाल शहरी इलाकों पर
मनोहर लाल खट्टर अभी तक शहरी इलाकों में ही कार्यकर्ताओं की मीटिंग्स और प्रोग्राम कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में उनके ज्यादा प्रोग्राम नहीं हुए। हालांकि प्रदेश के बाकी हिस्सों में जिस तरह किसान BJP उम्मीदवारों का विरोध कर रहे हैं, वैसा कुछ अभी तक करनाल संसदीय सीट पर नजर नहीं आया है। इसके बावजूद आज की तारीख में मनोहर लाल यहां सबसे मजबूत दिख रहे हैं।

अंबाला : बंतो को सहानुभूति की उम्मीद, वरुण के लिए कांग्रेस के सभी धड़े एकजुट
अंबाला लोकसभा सीट पर भाजपा ने महिला कार्ड चलते हुए बंतो कटारिया को टिकट दिया है जो यहां से पार्टी के पूर्व सांसद स्व. रतनलाल कटारिया की धर्मपत्नी है। 2019 में अंबाला से सांसद चुने गए रतनलाल कटारिया का पिछले साल 18 मई को पहले निधन हो गया था। BJP की रणनीति यहां बंतो कटारिया के प्रति लोगों की सहानुभूति को भुनाने की है।

कांग्रेस ने यहां अपने 44 वर्षीय विधायक वरुण चौधरी मुलाना को टिकट दिया है जो पूर्व केबिनेट मंत्री फूल चंद मुलाना के बेटे हैं। वरुण मुलाना की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उन्हें गुटबाजी में बंटी हरियाणा कांग्रेस के सभी धड़ों का समर्थन प्राप्त है। फिर चाहे वह कुमारी सैलजा का गुट हो या फिर भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा गुट से जुड़े निर्मल सिंह हों। हालांकि वरुण मुलाना को यहां बंतो कटारिया को टक्कर देने के लिए काफी मेहनत करनी होगी।

अनिल विज की नाराजगी पड़ सकती है भारी
हरियाणा में लगभग डेढ़ महीने पहले सरकार का चेहरा बदलने के बाद से BJP के वरिष्ठ नेता अनिल विज नाराज चल रहे हैं। वह नए सीएम नायब सिंह सैनी की कैबिनेट में भी शामिल नहीं हुए। मनोहर लाल के अलावा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी खुद अनिल विज के घर पहुंचकर मान-मनौव्वल कर चुके हैं लेकिन विज खुद के साथ हुए व्यवहार और अपनी उपेक्षा का दर्द गाहे-बगाहे बयां करते रहते हैं।

विज बंतो कटारिया के समर्थन और BJP के लिए काम करते रहने की बात कई बार कह चुके हैं लेकिन वह मनोहर लाल पर समय-समय पर जो निशाने साधते हैं, उससे वोटर सोचने पर मजबूर है।

कुरुक्षेत्र : ग्राउंड से कांग्रेस का सिंबल गायब, सुशील गुप्ता कांग्रेसी वोटबैंक पर डिपेंड
कुरुक्षेत्र संसदीय सीट पर इस बार कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गायब है क्योंकि पार्टी ने I.N.D.I.A. अलायंस के तहत यह सीट आम आदमी पार्टी (AAP) को दे दी है। AAP ने इस सीट से अपने प्रदेशाध्यक्ष सुशील गुप्ता को मैदान में उतारा है। उनके सामने BJP ने कांग्रेस के पूर्व सांसद नवीन जिंदल को टिकट दिया है। ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी, इनेलो से यहां खुद अभय सिंह चौटाला ताल ठोक चुके हैं।

कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट के तहत आने वाले इलाकों में ज्यादातर वोटर ग्रामीण हैं इसलिए अरबपति नवीन जिंदल मंडियों में गेहूं की बोरियां उठाते दिख रहे हैं तो सफेद मावेदार कुर्ता-पायजामा पहने सुशील गुप्ता दराती लेकर खेतों में गेहूं काट रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान हरियाणा की जीटी रोड बेल्ट में प्रदर्शनकारियों का गढ़ कुरुक्षेत्र और इससे सटा इलाका ही रहा। भाकियू नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के गुट का सबसे ज्यादा प्रभाव इसी इलाके में है। इनेलो नेता अभय चौटाला यहां ग्रामीण खासकर जाट वोटबैंक में जितनी ज्यादा सेंध लगाएंगे, जिंदल की राह उतनी ही आसान हो जाएगी।

जिंदल की अपनी पकड़, कैडर और मोदी फैक्टर से BJP को आस
कुरुक्षेत्र से सांसद रह चुके नवीन जिंदल की यहां मतदाताओं पर पकड़ है। BJP के कैडर वोटर का फायदा भी उनके मिलेगा। पिछली बार कुरुक्षेत्र से सांसद चुने गए हरियाणा के मौजूदा CM नायब सिंह सैनी भी चाहेंगे कि उनकी सीट पर पार्टी का कब्जा बरकरार रहे। महाभारत युद्ध की वजह से हिंदुओं में कुरुक्षेत्र का अपना महत्व है और यहां राममंदिर और मोदी फैक्टर चल सकता है।

हालांकि विपक्ष कोयला घोटाले में नवीन जिंदल को पानी पी-पीकर कोसने वाली BJP को घेरने की कोशिश में जुटा है।

गुप्ता का प्रदर्शन कांग्रेस के वोटबैंक पर निर्भर
INDIA अलायंस के कैंडिडेट और AAP नेता सुशील गुप्ता कुरुक्षेत्र की जनता के लिए नया चेहरा है। AAP के समूचे हरियाणा के नेता कुरुक्षेत्र में डट चुके हैं। पार्टी यहां दिल्ली के CM अरविंद केजरीवाल को जेल में डालने का मुद्दा उठाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रही है।

हरियाणा में छह महीने बाद विधानसभा चुनाव भी है जिसमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का अलग-अलग चुनाव लड़ना तय है। ऐसे में कांग्रेस यहां अपने कैडर और वोटबैंक को AAP के पक्ष में कितना मोड़ पाती है, सुशील गुप्ता का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा।

सोनीपत : जाटलैंड में दो ब्राह्मणों के बीच मुकाबला
सोनीपत लोकसभा सीट हरियाणा के जाटलैंड में आती है और इस बार यहां दो ब्राह्मणों के बीच मुख्य मुकाबला है। नॉन-जाट की राजनीति करने वाली BJP ने अपने सीटिंग सांसद रमेश कौशिक का टिकट काटकर ब्राह्मण कम्युनिटी से ताल्लुक रखने वाले मोहनलाल बड़ौली को उम्मीदवार बनाया। बड़ौली राई से विधायक हैं। कांग्रेस ने उनके सामने सतपाल ब्रह्मचारी को उतारा है जो कि ब्राह्मण समुदाय से ही हैं। सतपाल ब्रह्मचारी मूलत: जींद जिले में सफीदो एरिया के गांगोली गांव के रहने वाले हैं।

BJP-कांग्रेस के अलावा इनेलो ने रिटायर्ड डीएसपी अनूप दहिया को टिकट दिया है, JJP ने गोहाना के भूपेंदर मलिक को यहां से अपना उम्मीदवार का घोषित किया है | वह भी जाट बिरादरी से आते हैं और इन का गोत्र मलिक है | सोनीपत लोकसभा क्षेत्र में मलिक गोत्र के मतदाताओं की बहुसंख्यक मात्रा में है | JJP के उम्मीदवार भी कांग्रेस पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे |

सतपाल ब्रह्मचारी का हरिद्वार में आश्रम, जींद में डेरा
सतपाल ब्रह्मचारी राधा कृष्ण ब्रह्मचारी के शिष्य हैं। उनका गांगोली गांव में डेरा और सफीदों व पांडू पिंडारा में वक्तानंद आश्रम है। उनका हरिद्वार में थानाराम आश्रम और गौशाला है। उन्होंने 2012 और 2022 में कांग्रेस के टिकट पर हरिद्वार से विधानसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत नहीं पाए।

कांग्रेस लंबे समय बाद सोनीपत में लाई जींद का कैंडिडेट
सोनीपत संसदीय हलके में सोनीपत जिले की 6 और जींद जिले की 3 विधानसभा सीटें- जींद, सफीदों व जुलाना आती हैं। सोनीपत का एरिया पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा का गढ़ माना जाता है। 2019 में सोनीपत से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले हुड्‌डा जींद जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर पिछड़ गए थे और इसी कारण उनकी हार हुई। इसलिए इस बार कांग्रेस के रणनीतिकारों ने स्ट्रेटेजी बदलते हुए, जींद में अपना प्रदर्शन सुधारने की रणनीति के तहत सतपाल ब्रह्मचारी पर दांव लगाया। पार्टी का मानना है कि हुड्‌डा के चलते सोनीपत के जाट वोट तो उसे मिल ही जाएंगे।

कांग्रेस पार्टी ने लंबे समय बाद सोनीपत संसदीय सीट पर जींद जिले से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाया है।

मोहनलाल बड़ौली की राह आसान नहीं
2014 और 2019 में सोनीपत सीट जीत चुकी भाजपा के लिए इस बार राह आसान नहीं है। पार्टी प्रत्याशी मोहनलाल बड़ौली का यह पहला ही लोकसभा चुनाव है। हरियाणा की जाट बिरादरी BJP की बजाय कांग्रेस, इनेलो और JJP को वोट देना ज्यादा पसंद करती है। अगर कांग्रेस का सतपाल ब्रह्मचारी वाला दाव ठीक बैठा तो यहां BJP को गैरजाट वाले कार्ड से सफलता मिलनी मुश्किल हो जाएगी।

रोहतक : हुड्‌डा फैमिली के लिए नाक की लड़ाई, BJP कमजोर नहीं
रोहतक को हरियाणा की हॉट सीट माना जाता है और इसकी वजह है हुड्‌डा परिवार का यहां से ताल्लुक रखना। हालांकि हुड्‌डा फैमिली का ये गढ़ 2019 में ढह गया जब BJP ने उन्हीं के पुराने साथी डॉ. अरविंद शर्मा को पार्टी में शामिल कर मैदान में उतार दिया। अरविंद शर्मा ने दीपेंद्र हुड्डा को तकरीबन 7500 वोट से हराया। हालांकि हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटों पर विनिंग मार्जिन के लिहाज से यह अंतर सबसे कम था।

जाट-गैरजाट का मुद्दा आज भी जिंदा
पिछले 5 बरसों में दीपेंद्र हुड्‌डा ने यहां काफी मेहनत की लेकिन इस बार भी उनकी राह इतनी आसान नहीं दिखती। जाट और गैरजाट का मुद्दा यहां की हवा में आज भी है। रोहतक संसदीय हलके में शामिल कोसली विधानसभा सीट पर 2019 में BJP प्रत्याशी के पक्ष में एकतरफा वोटिंग हुई थी और यहां से दीपेंद्र हुड्‌डा 75 हजार वोटों से पिछड़े जिसे वह आखिर तक बराबर नहीं कर पाए। कोसली में इस बार भी माहौल BJP के पक्ष में दिखता है। हालांकि हुड्‌डा कैंप पूर्व मंत्री जगदीश यादव को अपने पाले में ला चुका है लेकिन वह वोटरों को कांग्रेस में पक्ष में कितना मोड़ पाएंगे, यह देखना होगा।

अहीर बाहुल्य इलाके में अग्निवीर योजना का विरोध
कोसली अहीर बाहुल्य इलाका है और इसे सैनिकों की खान भी कहा जाता है। ऐसे में कांग्रेस यहां मोदी सरकार की अग्निवीर योजना का विरोध करने के साथ-साथ अहीर रेजिमेंट की पुरानी मांग को हवा दे रही है। हालांकि इसके उल्ट रोहतक सिटी, बहादुरगढ़ और महम जैसे शहरी इलाकों में मोदी फैक्टर और राममंदिर की गूंज साफ सुनाई देती है।

 

 

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