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महाराणा ने जंगलों में रहना मंजूर किया, मुगलों की दासता नहीं

गोहाना :-19 जनवरी : मुगलों से जिंदगी की आखिरी सांस तक लोहा लेते हुए महाराणा प्रताप ने उनकी दासता को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने उच्च आदर्श स्थापित करते हुए जंगलों में रहना पसंद किया और अपने आत्म सम्मान को दांव पर नहीं लगाया।

शुक्रवार को यह टिप्पणी आजाद हिंद देशभक्त मोर्चे के मुख्य संरक्षक आजाद सिंह दांगी ने की । वह शहर में पुराने बस स्टैंड पर स्थित शहीद स्मारक पर महाराणा के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे थे। अध्यक्षता मोर्चे के निदेशक डॉ. सुरेश सेतिया ने की।

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आजाद सिंह दांगी ने कहा कि महाराणा प्रताप के शौर्य और पराक्रम के समक्ष मुगल भी नतमस्तक होते थे । जब मुगल सम्राट अकबर को महाराणा के न रहने की मनहूस सूचना मिली, तब उनकी आंखें भी छलके बिना नहीं रही थीं। डॉ. सेतिया ने कहा कि 1597 में दुनिया को अलविदा कहने तक महाराणा ने मुगलों के दांत खट्टे किए।

इस अवसर पर हरभगवान चोपड़ा, उमेद सिंह पांचाल, सुरेश कुमार, सुभाष शर्मा, राजपाल कश्यप, धर्मपाल नरवाल आदि भी उपस्थित थे।

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