
देशभर में त्योहारों का मौसम आ चुका है। दशहरा बीत चुका और 8 नवंबर को दिवाली के बाद छठ, गुरु पर्व, शादी-विवाह का मौसम और क्रिसमस जैसे त्योहार आने वाले हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 341 पर पहुंच गया है और वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आ गई। इसके बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) के दूसरे चरण को लागू कर दिया है। वर्ष 2025 में दिवाली के अगले दिन सुबह गुरुग्राम की हवा ‘बेहद खराब’ श्रेणी में पहुंच गई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, शहर का 24 घंटे का औसत एक्यूआई 351 दर्ज किया गया, जो बाद में बढ़कर 370 तक पहुंच गया। ऐसे में परिवारों के सामने एक व्यावहारिक सवाल है कि त्योहारों का पूरा आनंद लेते हुए बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य को कैसे सुरक्षित रखा जाए?
इसका जवाब है- पहले से तैयारी करना, यानी समय रहते योजना बनाना और सामूहिक रूप से एक-दूसरे की चिंता करना। गुरुग्राम हर मानसून में इस सच्चाई को महसूस करता है। कुछ घंटों की बारिश सड़कों को दरिया में बदल देती है और लोगों के सामने एक ही सवाल होता है कि उनका परिवार सुरक्षित है या नहीं और जरूरत पड़ने पर कहां जाना है। वायु प्रदूषण भी धीमी गति से आने वाला एक आपात संकट है, लेकिन इससे जुड़ा मूल सवाल वही है।
तैयारी की शुरुआत घर से होती है और इसके लिए बहुत अधिक खर्च करने की भी जरूरत नहीं है। परिवार की एक सामान्य-सी योजना में आपातकालीन नंबर (112), नियमित रूप से ली जाने वाली दवाइयां, प्राथमिक उपचार किट और जरूरत पड़ने पर परिवार के सदस्यों के मिलने का एक निर्धारित स्थान शामिल होना चाहिए। मौजूदा मौसम में इसका अर्थ यह भी है कि सुबह की सैर पर जाने से पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समीर एप पर प्रतिदिन एक्यूआई की जांच की जाए, आवश्यकता और जारी सलाह के अनुसार अच्छी तरह फिट होने वाला एन95 मास्क पहना जाए तथा प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर बच्चों और बुजुर्गों को घर के भीतर ही रखा जाए। ये सुझाव वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं और चिकित्सक की सलाह का विकल्प नहीं, बल्कि उसके पूरक हैं।
हमारे त्योहार भी हमें इसी दिशा में आगे बढ़ने का संदेश देते हैं। ये रोशनी, नई शुरुआत और आपसी मेल-मिलाप के प्रतीक हैं। दीपक, रंगोली, फूल, संगीत और मिल-बांटकर मिठाइयां खाने जैसी परंपराएं बिना किसी के फेफड़ों को नुकसान पहुंचाए खुशियां मनाने के सुंदर तरीके हैं। पिछले वर्ष जारी आदेश की तरह गुरुग्राम जिला प्रशासन ने इस बार भी केवल सीएस आईआर-नीरी से प्रमाणित ग्रीन पटाखों की अनुमति दी है। त्योहारों का यह समय अनेक व्यापारियों और श्रमिकों की आजीविका का भी आधार होता है। ऐसे में नियमों का पालन सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन , स्कूल और नगर निकाय इन व्यापारियों एवं श्रमिकों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, न कि उनके विरोध में।
परिवारों को सही मार्गदर्शन मिले तो वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं। यहां विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे शैक्षणिक परिसरों में ज्ञान और विशेषज्ञता का विशाल भंडार है, लेकिन अक्सर यह शोध पत्रिकाओं तक ही सीमित रह जाता है, जिन्हें आम लोग नहीं पढ़ पाते। यह ज्ञान तभी जनसामान्य तक पहुंचता है, जब इसे स्थानीय भाषाओं में, व्यावहारिक प्रदर्शन और साझेदारी के माध्यम से साझा किया जाए, न कि केवल उपदेश देने के अंदाज में। इसकी शुरुआत समुदाय की जरूरतों को समझने वाले एक सरल सवाल से होनी चाहिए- आखिर लोगों को क्या चाहिए?
एसजीटी यूनिवर्सिटी में सेल फॉर होलिस्टिक सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सीएचएसडी) विभिन्न परिसर-आधारित और सामुदायिक पहुंच कार्यक्रमों के माध्यम से सामुदायिक सुदृढ़ता तथा सतत जीवनशैली को प्रोत्साहित करता है। मॉक ड्रिल, कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण की प्रक्रियाओं और जागरूकता अभियानों जैसी गतिविधियों के माध्यम से यह सेल विद्यार्थियों को अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन में परिसर से बाहर निकलकर आसपास के समुदायों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करता है। इन पहलों से पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, आपदा से निपटने की तैयारी और सामूहिक प्रयासों की भावना विकसित होती है। ये गतिविधियां दर्शाती हैं कि शैक्षणिक संस्थान समुदायों को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और टिकाऊ जीवनशैली अपनाने के लिए किस प्रकार सशक्त बना सकते हैं।
भारत इस दिशा में पहले ही अपनी प्रतिबद्धता जता चुका है। नवंबर 2016 में नई दिल्ली में घोषित प्रधानमंत्री के आपदा जोखिम न्यूनीकरण संबंधी दस सूत्रीय एजेंडे में महिलाओं के नेतृत्व और विश्वविद्यालयों के नेटवर्क को विशेष महत्व दिया गया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) इस दिशा में वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराता है, जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) आपदा जोखिम न्यूनीकरण को पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाने तथा सामुदायिक सहभागिता को अकादमिक कार्यों के महत्वपूर्ण अंग के रूप में मान्यता देने में मदद कर सकते हैं।
सामुदायिक सुदृढ़ता की अवधारणा तब तक अधूरी है, जब तक इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग को शामिल न किया जाए। दिहाड़ी मजदूर के लिए वायु गुणवत्ता बेहद खराब होने पर भी घर के भीतर रहना संभव नहीं होता। महिलाएं, दिव्यांगजन और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करते हैं, जबकि उनके पास ऐसा व्यावहारिक अनुभव और ज्ञान होता है, जिसकी समुदाय को जरूरत है। समावेशिता का अर्थ है- सभी की पहुंच के अनुकूल आयोजन स्थल, स्थानीय भाषाओं में जागरूकता सामग्री और सुविधाजनक समय पर कार्यक्रमों का आयोजन।
सफलता का आकलन भी ईमानदारी से किया जाना चाहिए। कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों की संख्या गिनना आसान है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि लोगों के व्यवहार में कोई बदलाव आया है या नहीं। सफलता के बेहतर पैमाने यह होंगे कि कितने परिवारों ने अपनी सुरक्षा के लिए पारिवारिक योजना बनाई है और कितने लोग घर से बाहर निकलने से पहले एक्यूआई की जांच करते हैं। एक विश्वविद्यालय के रूप में हमें अपनी सफलताओं के साथ-साथ अपनी कमियों और असफलताओं को भी साझा करना चाहिए।
यही वैश्विक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय स्तर पर कार्य करने का वास्तविक अर्थ है। सेंडाई फ्रेमवर्क और सतत विकास लक्ष्य (एसडीजीस) हमें एक साझा दिशा और उद्देश्य प्रदान करते हैं, लेकिन वैश्विक लक्ष्यों की प्राप्ति केवल सम्मेलनों और सभागारों में चर्चा करने से नहीं हो सकती। ये लक्ष्य तभी पूरे होंगे, जब कोई परिवार सुबह की सैर पर जाने से पहले हवा की गुणवत्ता जांचेगा, कोई विद्यार्थी अपने बुजुर्ग पड़ोसी को स्वास्थ्य संबंधी सलाह समझाएगा और कोई शैक्षणिक परिसर अपने ज्ञान एवं संसाधनों को साझा करने के लिए समुदाय के लोगों के लिए अपने द्वार खोलेगा।
इस त्योहार के मौसम में अपनाएं ये तीन आसान उपाय :
•घर से बाहर निकलने से पहले प्रतिदिन वायु गुणवत्ता सूचकांक की जांच करें।
•घर में परिवार के सभी सदस्यों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए एन95 मास्क उपलब्ध रखें।
•अपने आसपास रहने वाले बुजुर्ग पड़ोसियों का हालचाल जानें और उन्हें जरूरी जानकारी एवं सुझाव साझा करें।
इस दिवाली हमारी खुशियों की असली कसौटी बहुत सरल है- क्या त्योहार के अगले दिन सुबह कोई बच्चा और उसके दादा-दादी बिना किसी परेशानी के सांस ले पाएंगे? यदि हम स्वच्छ हवा और सामुदायिक देखभाल को साझा जिम्मेदारी मानकर आगे बढ़ें, तो अगली बार जब मूसलाधार बारिश हो या भीषण गर्मी पड़े और हमारे सामने यह सवाल आए कि ‘क्या मेरा परिवार सुरक्षित है?’, तब हम पूरे विश्वास के साथ इसका जवाब ‘हां’ में दे सकेंगे।
लेखिका एसजीटी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर एवं सेल फॉर होलिस्टिक सस्टेनेबल डेवलपमेंट की प्रमुख हैं।


