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भारत में एनआईआरएफ रैंकिंग में छिपी क्षेत्रीय असमानता

उत्कृष्टता की दौड़ या संसाधनों का असंतुलन?

लेखक: डॉ. नितेश सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं एचओडी, डिवीजन ऑफ प्लांट प्रोटेक्शन, फैकल्टी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज, एसजीटी यूनिवर्सिटी

गुरुग्राम, भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार केवल विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध, नवाचार और सामाजिक विकास के अवसरों को देश के प्रत्येक क्षेत्र तक पहुँचाना है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता का आकलन करने और विद्यार्थियों को संस्थानों के चयन में सहायता देने के लिए वर्ष 2015 में शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की शुरुआत की। इस व्यवस्था ने उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के रैंकिंग आंकड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाते हैं क्या भारत की विश्वविद्यालय रैंकिंग व्यवस्था देश के सभी क्षेत्रों में शैक्षणिक उत्कृष्टता को समान रूप से पहचान रही है, या पहले से विकसित और संसाधन-संपन्न संस्थानों को इसका अधिक लाभ मिल रहा है?

रैंकिंग व्यवस्था का उद्देश्य और उसका बढ़ता प्रभाव

एनआईआरएफ का मूल उद्देश्य शिक्षण, शोध, स्नातक परिणाम, समावेशन और संस्थागत प्रतिष्ठा जैसे मानकों के आधार पर उच्च शिक्षा संस्थानों का व्यवस्थित मूल्यांकन करना है। इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों को विश्वविद्यालयों की तुलना करने में सहायता मिलती है। साथ ही, संस्थानों को अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रेरणा मिलती है लेकिन समय के साथ रैंकिंग केवल मूल्यांकन का माध्यम नहीं रह गई है। इसका प्रभाव विश्वविद्यालयों की रणनीतिक योजना, शोध निवेश, संकाय भर्ती और संस्थागत प्रतिष्ठा पर भी पड़ने लगा है। जब किसी विश्वविद्यालय की सफलता का आकलन कुछ निर्धारित मानकों के आधार पर होता है, तो संस्थान स्वाभाविक रूप से उन मानकों पर अधिक ध्यान देने लगते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी संस्थान की रैंकिंग में शोध प्रकाशनों और उद्धरणों का महत्त्व है, तो वह अधिक शोध-पत्र प्रकाशित करने के लिए संसाधन आवंटित कर सकता है। यह सकारात्मक कदम है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब शोध प्रकाशनों की संख्या बढ़ाने की प्राथमिकता नियमित कक्षाओं, विद्यार्थियों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन, स्थानीय समस्याओं पर शोध और सामुदायिक सहभागिता से अधिक हो जाती है। इसलिए आवश्यक है कि रैंकिंग के अंकों में सुधार के साथ-साथ शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता और समाज पर उसके प्रभाव का भी मूल्यांकन किया जाए।

नौ वर्षों के आंकड़े और क्षेत्रीय असमानता का प्रश्न

वर्ष 2016 से 2024 तक की एनआईआरएफ विश्वविद्यालय रैंकिंग के आंकड़े इस बहस को एक महत्वपूर्ण दिशा देते हैं। उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, इन नौ वर्षों में कई अलग-अलग विश्वविद्यालय कम-से-कम एक बार शीर्ष 100 की सूची में शामिल हुए। इनमें दक्षिण भारत के चार राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल के संस्थानों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही है। यह आंकड़ा अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि रैंकिंग व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है या इन राज्यों के विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता अनुचित रूप से अधिक आंकी गई है। हालांकि, यह उच्च शिक्षा के क्षेत्रीय वितरण, संस्थागत क्षमताओं और दीर्घकालिक निवेश का गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता अवश्य दर्शाता है। दक्षिण भारत के अनेक राज्यों में उच्च शिक्षा के विस्तार, निजी और सार्वजनिक संस्थानों के विकास, तकनीकी शिक्षा तथा शोध सुविधाओं के निर्माण में लंबे समय से निवेश हुआ है। इसके परिणामस्वरूप कई संस्थानों को मजबूत शैक्षणिक आधार, अनुभवी संकाय, बेहतर प्रयोगशालाएं और शोध सहयोग प्राप्त हुए हैं। इसके विपरीत, कुछ अन्य क्षेत्रों के विश्वविद्यालय सीमित वित्तीय संसाधनों, रिक्त शिक्षकीय पदों, अपर्याप्त प्रयोगशालाओं और शोध सुविधाओं की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसे में एक ही मूल्यांकन व्यवस्था के अंतर्गत सभी संस्थानों से समान स्तर के परिणामों की अपेक्षा करना उनकी शुरुआती परिस्थितियों में मौजूद अंतर को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर सकता।

संसाधनों का चक्र: जो आगे है, उसके और आगे बढ़ने की संभावना

उच्च शिक्षा में संसाधनों और उपलब्धियों के बीच एक परस्पर मजबूत संबंध होता है। जिन विश्वविद्यालयों के पास पर्याप्त वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रयोगशालाएं और अनुभवी शोधकर्ता होते हैं, वे बेहतर शोध परिणाम प्राप्त करने की अधिक क्षमता रखते हैं। अच्छे शोध परिणाम संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं, जिससे नए शोध सहयोग, प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और अतिरिक्त वित्तीय अवसरों की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं। इस प्रकार एक सकारात्मक चक्र विकसित होता है बेहतर संसाधन बेहतर शोध को प्रोत्साहित करते हैं, बेहतर शोध प्रतिष्ठा बढ़ाता है और बढ़ी हुई प्रतिष्ठा नए अवसरों के द्वार खोल सकती है।इसके विपरीत, संसाधनों की कमी से जूझ रहे विश्वविद्यालयों के लिए इस चक्र में प्रवेश करना कठिन हो सकता है। यदि किसी संस्थान के पास आधुनिक उपकरण नहीं हैं, तो उसके शोधकर्ताओं को प्रयोग करने और प्रतिस्पर्धी शोध परिणाम प्राप्त करने में कठिनाई होगी। कम शोध उपलब्धियों के कारण उसकी प्रतिष्ठा सीमित रह सकती है, जिससे नए सहयोग और संसाधन प्राप्त करने की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसे खेल के उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि एक शहर के खिलाड़ियों को आधुनिक स्टेडियम, प्रशिक्षित कोच, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और पौष्टिक आहार उपलब्ध हों, जबकि दूसरे शहर के खिलाड़ी बुनियादी सुविधाओं के बिना अभ्यास करें, तो दोनों के प्रदर्शन की तुलना करते समय उनकी परिस्थितियों को भी समझना होगा। केवल अंतिम परिणाम के आधार पर प्रतिभा का पूरा आकलन करना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार, विश्वविद्यालयों की उपलब्धियों के मूल्यांकन में उनके वास्तविक प्रदर्शन के साथ-साथ उनकी संस्थागत क्षमता और उपलब्ध अवसरों पर भी विचार करना आवश्यक है।

रैंकिंग में स्थान बनाए रखना और नई संस्थाओं की चुनौतियां

किसी विश्वविद्यालय का शीर्ष 100 में एक बार शामिल होना और लगातार कई वर्षों तक उसमें बने रहना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, कुछ संस्थान ही लगातार वर्ष-दर-वर्ष सूची में बने रहे। इस स्थिति को समझने के लिए संस्थागत निरंतरता और रैंकिंग में गतिशीलता के बीच अंतर करना आवश्यक है। नई संस्थाओं का रैंकिंग में प्रवेश करना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का संकेत हो सकता है। इससे यह पता चलता है कि विश्वविद्यालयों को सुधार के अवसर मिल रहे हैं और सूची में परिवर्तन संभव है। लेकिन प्रत्येक नई प्रविष्टि को स्थायी संस्थागत विकास का प्रमाण भी नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, किसी विश्वविद्यालय को एक वर्ष किसी विशेष शोध परियोजना के लिए अनुदान मिल जाए या उसके किसी शोधकर्ता का उत्कृष्ट शोध-पत्र प्रकाशित हो जाए, तो उसके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। हालांकि, यदि अगले वर्ष पर्याप्त वित्तीय सहायता, स्थायी संकाय और शोध सुविधाएं उपलब्ध न रहें, तो उस प्रदर्शन को बनाए रखना कठिन हो सकता है। यह उदाहरण किसी विशिष्ट विश्वविद्यालय के वास्तविक प्रदर्शन का दावा नहीं है, बल्कि संस्थागत विकास की एक संभावित स्थिति को समझाने का माध्यम है। स्थायी उत्कृष्टता के लिए एक बार की उपलब्धियों से आगे बढ़कर नियमित वित्तपोषण, प्रशिक्षित मानव संसाधन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और दीर्घकालिक शोध संस्कृति विकसित करना आवश्यक है।

क्या रैंकिंग वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता का पूरा चित्र प्रस्तुत करती है?

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रैंकिंग की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। यह संस्थानों को अपने प्रदर्शन की समीक्षा करने, कमियों की पहचान करने और सुधार के लिए लक्ष्य निर्धारित करने का अवसर देती है। लेकिन किसी विश्वविद्यालय की गुणवत्ता को केवल एक समग्र अंक या रैंक तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। उदाहरण के लिए, किसी विश्वविद्यालय में प्रकाशित शोध-पत्रों की संख्या अधिक हो सकती है, लेकिन यह देखना भी आवश्यक है कि उस शोध से स्थानीय कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण या उद्योग की समस्याओं का समाधान कितना हुआ। इसी प्रकार, किसी संस्थान में उत्कृष्ट प्रयोगशालाएं हो सकती हैं, लेकिन यदि विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण, नियमित कक्षाएं और पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिल रहा, तो उसकी शैक्षणिक गुणवत्ता का आकलन अधूरा रहेगा। मान लीजिए कि कृषि क्षेत्र में स्थित किसी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता स्थानीय मिट्टी की गुणवत्ता, फसल रोगों, कीट प्रबंधन और किसानों की उत्पादन लागत पर काम करते हैं। उनके शोध से किसानों को उपयोगी समाधान मिलते हैं और उत्पादन में सुधार होता है। दूसरी ओर, कोई संस्थान अधिक शोध-पत्र प्रकाशित करता है, लेकिन उसके शोध का स्थानीय समस्याओं से सीमित संबंध है। दोनों प्रकार के शोध का महत्त्व हो सकता है, परंतु सामाजिक उपयोगिता और स्थानीय प्रभाव को भी मूल्यांकन में उचित स्थान मिलना चाहिए।इसलिए शोध की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता, प्रासंगिकता, मौलिकता और वास्तविक उपयोगिता पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

क्षेत्रीय प्रतिभा का पलायन और विकास पर प्रभाव

क्षेत्रीय असमानता का प्रभाव केवल विश्वविद्यालयों की रैंकिंग तक सीमित नहीं रहता। इसका असर विद्यार्थियों, स्थानीय उद्योगों, रोजगार और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि किसी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के पर्याप्त अवसर नहीं हैं, तो वहां के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा और शोध के लिए दूसरे शहरों या राज्यों की ओर जाना पड़ सकता है। इससे विद्यार्थियों को अवसर मिल सकते हैं, लेकिन उनके गृह क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन और शोध क्षमता विकसित करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिए, किसी छोटे शहर में कृषि आधारित उद्योगों की पर्याप्त संभावनाएं हों, लेकिन वहां की उच्च शिक्षा संस्थाओं में खाद्य प्रसंस्करण, कृषि जैव प्रौद्योगिकी या मृदा स्वास्थ्य पर उन्नत शोध की सुविधाएं सीमित हों, तो स्थानीय उद्योगों को विशेषज्ञता के लिए अन्य क्षेत्रों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।इसके विपरीत, यदि उसी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों में आधुनिक प्रयोगशालाएं, उद्योग सहयोग और गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम विकसित किए जाएं, तो स्थानीय विद्यार्थियों को बेहतर अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, स्थानीय उद्योगों को प्रशिक्षित मानव संसाधन और समस्याओं के समाधान के लिए शोध सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार उच्च शिक्षा का संतुलित विकास केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक प्रगति और सामाजिक सशक्तीकरण की भी आवश्यक शर्त है।

समाधान: लक्षित निवेश और संस्थागत सहयोग

क्षेत्रीय असमानता को कम करने के लिए केवल रैंकिंग के मानकों में परिवर्तन पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ उन क्षेत्रों की संस्थागत क्षमता मजबूत करनी होगी, जहां उच्च शिक्षा और शोध का आधार अभी अपेक्षाकृत कमजोर है।

पहला, लक्षित वित्तीय निवेश:

सरकार को उन विश्वविद्यालयों की पहचान करनी चाहिए जिन्हें आधुनिक प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, डिजिटल संसाधनों और शोध सुविधाओं की विशेष आवश्यकता है। वित्तीय सहायता का निर्धारण केवल वर्तमान रैंक के आधार पर न होकर संस्थान की वास्तविक जरूरतों, विकास की संभावनाओं और प्रस्तावित सुधारों के आधार पर भी होना चाहिए।

दूसरा, संकाय भर्ती और क्षमता निर्माण:

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता आवश्यक है। कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में शिक्षकों की नियमित भर्ती, शोध प्रशिक्षण, व्यावसायिक विकास और प्रतिभाशाली संकाय को आकर्षित करने के लिए उपयुक्त प्रोत्साहन उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

तीसरा, मजबूत विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग:

देश के स्थापित विश्वविद्यालयों, केंद्रीय संस्थानों और तकनीकी संस्थानों को उभरते क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों के साथ दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करनी चाहिए। साझा प्रयोगशालाएँ, संयुक्त शोध परियोजनाएँ, संकाय आदान-प्रदान और सह-मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएँ संसाधनों की कमी को दूर करने में सहायता कर सकती हैं।उदाहरण के लिए, यदि किसी छोटे शहर के विश्वविद्यालय के पास उन्नत सूक्ष्मदर्शी या महँगे शोध उपकरण उपलब्ध नहीं हैं, तो निकटवर्ती बड़े संस्थान के साथ समझौते के माध्यम से उसके शोधार्थियों को उन सुविधाओं तक पहुँच दी जा सकती है। दोनों संस्थान संयुक्त शोध परियोजनाएँ संचालित कर सकते हैं और अपने अनुभवों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

चौथा, क्षेत्रीय समस्याओं पर आधारित शोध:

विश्वविद्यालयों को स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़े शोध को प्रोत्साहित करना चाहिए। कृषि प्रधान क्षेत्रों में फसल रोग, जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य और कृषि अपशिष्ट का उपयोग महत्त्वपूर्ण विषय हो सकते हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण, कौशल विकास और उत्पादन तकनीकों पर शोध उपयोगी हो सकता है। इसी प्रकार, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी वाले क्षेत्रों में जनस्वास्थ्य और किफायती तकनीकों पर शोध को बढ़ावा दिया जा सकता है।

पांचवां, संतुलित मूल्यांकन:

रैंकिंग में संस्थानों के वर्तमान प्रदर्शन के साथ उनकी प्रगति, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग, शिक्षण गुणवत्ता, सामाजिक प्रभाव और क्षेत्रीय योगदान को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए। इससे कमजोर संस्थानों को सुधार के लिए स्पष्ट दिशा मिल सकती है और उनके विकास को अधिक व्यापक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और संतुलित विकास की आवश्यकता

भारत में संतुलित उच्च शिक्षा विकास की अवधारणा नई नहीं है। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग, जिसे राधाकृष्णन आयोग के नाम से जाना जाता है, ने स्वतंत्रता के बाद विश्वविद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता और विकास पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए थे। इसी व्यापक उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुविषयक शिक्षा, समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और शोध को प्रोत्साहित करती है।हालांकि, नीतिगत उद्देश्यों को वास्तविक परिणामों में बदलने के लिए संस्थागत स्तर पर निरंतर कार्य करना आवश्यक है। केवल नए संस्थान खोलना पर्याप्त नहीं है; उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, पर्याप्त वित्तीय संसाधन, आधुनिक सुविधाएं और अकादमिक स्वतंत्रता भी उपलब्ध करानी होगी।साथ ही, गुणवत्ता आश्वासन और मान्यता की व्यवस्थाओं को संस्थानों की कमियों की पहचान करने तथा सुधार के अवसर उपलब्ध कराने में प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए।

रैंकिंग को प्रतिस्पर्धा के साथ सुधार का माध्यम बनाएं

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है। लेकिन राष्ट्रीय शैक्षणिक उत्कृष्टता का निर्माण केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों की सफलता से संभव नहीं होगा। इसके लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध और नवाचार का व्यापक नेटवर्क विकसित करना होगा।

एनआईआरएफ जैसी रैंकिंग व्यवस्थाएं उपयोगी हैं, बशर्ते उनका उद्देश्य केवल संस्थानों को क्रम देना न हो, बल्कि उनकी वास्तविक जरूरतों और सुधार की संभावनाओं को पहचानना भी हो। रैंकिंग में कम स्थान प्राप्त करने वाले विश्वविद्यालयों को केवल पीछे छूटे संस्थानों के रूप में देखने के बजाय यह समझना चाहिए कि उनकी कमियों को दूर करने के लिए किन संसाधनों, सहयोग और नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है। आखिरकार, किसी विश्वविद्यालय की उत्कृष्टता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितने शोध-पत्र प्रकाशित किए या उसे कौन-सी रैंक प्राप्त हुई। यह भी देखना चाहिए कि उसने अपने विद्यार्थियों को कितना सक्षम बनाया, अपने क्षेत्र की समस्याओं के कितने उपयोगी समाधान विकसित किए और समाज के जीवन को बेहतर बनाने में कितना योगदान दिया।

एक मजबूत विश्वविद्यालय व्यवस्था वह नहीं है, जिसमें कुछ संस्थान लगातार शीर्ष पर बने रहें; बल्कि वह है, जिसमें देश के हर क्षेत्र के संस्थानों को उत्कृष्टता हासिल करने के लिए वास्तविक अवसर और आवश्यक संसाधन मिलें। यही दृष्टिकोण भारत को एक समावेशी, नवाचारी और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे ले जा सकता है।

Khabar Abtak

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