किसान विज्ञान केंद्र में प्राकृतिक खेती पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू, 22 गांवों के 50 किसान ले रहे भाग

सोनीपत, 13 मार्च। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बलदेव राज कंबोज के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा प्राकृतिक खेती पर आयोजित किया जा रहे तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुक्रवार को शुरुआत हुई। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को हरियाणा कृषि प्रबंधन एवं विस्तार संस्थान, जींद के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है।
सोनीपत जिले में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित यह चौथा प्रशिक्षण कार्यक्रम है, जिसमें जिले के 22 गांवों के 50 किसान भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम के संयोजक डॉ परमिंदर सिंह ने बताया कि प्राकृतिक खेती में महंगी रासायनिक खाद, कीटनाशकों तथा अन्य महंगे कृषि उत्पादों का उपयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर प्राकृतिक संसाधनों जैसे जीवामृत, घनजीवामृत, दशप्रणी अर्क, अग्निअस्त्र और बीजामृत आदि का प्रयोग किया जाता है। इससे मिट्टी, हवा, पानी, भोजन और पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से उगाई गई फसलें जहर मुक्त होती हैं और मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक सुरक्षित व पौष्टिक मानी जाती हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती मिशन वर्ष 2024 में शुरू किया गया है, जिसके लिए 2481 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। अगले दो वर्षों में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को इच्छुक ग्राम पंचायतों के लगभग 15 हजार समूहों में लागू किया जाएगा तथा इसे एक करोड़ किसानों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही लगभग 7.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। किसानों की सुविधा के लिए 10 हजार जैव आदान संसाधन केंद्र भी स्थापित किए जा रहे हैं, जहां प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक जैविक आदान उपलब्ध कराए जाएंगे।
इस अवसर पर प्रगतिशील व प्राकृतिक किसान शैशन मलिक ने किसानों को प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांतों, इसकी आवश्यकता तथा कीट एवं रोग नियंत्रण के प्राकृतिक तरीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे प्राकृतिक खेती से प्राप्त उत्पादों की प्रोसेसिंग कर शहरों में सीधे बिक्री करते हैं, जिससे उन्हें अपने उत्पादों का अच्छा मूल्य प्राप्त हो रहा है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों, इसके लाभों और व्यवहारिक प्रयोगों के बारे में विस्तार से प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे इसे अपनाकर टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा दे सकें।



