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मृदा परीक्षण से बढ़ेगा उत्पादन, घटेगी लागत: डॉ शक्ति सिंह 

खेत को समान भागों में बांट कर 'जिग-जैग' पद्धति से 8–10 स्थानों से नमूना लें

गुरुग्राम, 11जून । जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और प्रगतिशील खेती को नया रूप देकर किसानों की समृद्धि की अलख जगाने वाले डॉ. शक्ति ओम पाठक का कहना है कि कृषि प्रधान देश भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर करती है। देश में मिट्टी की घटती उर्वरता, कम होता कृषि उत्पादन व खाद्य सुरक्षा गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

कृषक जागरूकता मिशन के तहत अनेक शिविर आयोजित कर चुके डॉ शक्ति ओम पाठक ने कहा है कि खेती की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार स्वस्थ, उपजाऊ और संतुलित मिट्टी है। यदि मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में उपलब्ध हों, तो फसल उत्पादन बढ़ता है, गुणवत्ता सुधरती है और किसानों की आय में वृद्धि होती है। किंतु रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, जैविक पदार्थों की कमी, भूमि क्षरण, जल प्रबंधन की त्रुटियों तथा लगातार एक ही फसल प्रणाली अपनाने के कारण मिट्टी की उर्वरता लगातार प्रभावित हो रही है। ऐसे में मृदा परीक्षण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि टिकाऊ, वैज्ञानिक और लाभकारी कृषि की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।

एसजीटी यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर

डॉ शक्ति सिंह पाठक ने मानसून पूर्व एक विशेष शिविर में कहा कि मृदा परीक्षण किसानों को उनकी मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, आयरन, बोरॉन जैसे प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति की जानकारी देता है। इसके माध्यम से मिट्टी की उर्वरता, पीएच, लवणीयता, जैविक कार्बन तथा पोषण संतुलन का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है। इसी आधार पर किसान फसल की आवश्यकता अनुसार सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय और सही विधि अपना सकते हैं। इससे उत्पादन लागत घटती है, उर्वरकों की बर्बादी रुकती है, पर्यावरण प्रदूषण कम होता है और मिट्टी की दीर्घकालिक उत्पादकता सुरक्षित रहती है। सरल शब्दों में“मिट्टी की जांच ही खेती की सुरक्षा” है।

मृदा परीक्षण की सफलता सही समय पर सही नमूना लेने पर निर्भर करती है। सामान्यतः फसल कटाई के 20-30 दिन बाद या नई फसल की बुवाई/रोपाई से पूर्व मिट्टी की जांच सर्वोत्तम मानी जाती है। उर्वरक डालने, सिंचाई करने या वर्षा के तुरंत बाद नमूना नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इससे परीक्षण परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। प्रत्येक 2-3 वर्ष में नियमित मृदा परीक्षण किसानों को मिट्टी की वास्तविक पोषक स्थिति समझने और वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन अपनाने में मदद करता है।

उन्होंने बताया कि मृदा नमूना संग्रहण के दौरान वैज्ञानिक सावधानियां अत्यंत आवश्यक हैं। खेत को समान भागों में विभाजित कर ‘जिग-जैग’ पद्धति से 8–10 स्थानों से नमूना लेना चाहिए। पेड़ों के नीचे, मेड़ों के पास, जलभराव वाले स्थानों, खाद के ढेर या उर्वरक भंडारण क्षेत्र के पास से नमूना नहीं लेना चाहिए। सामान्य खेतों में प्रायः 0–15 सेमी गहराई तक मिट्टी ली जाती है, जबकि बागों एवं विशेष भूमि परिस्थितियों में अलग-अलग गहराइयों से नमूना लेना अधिक उपयोगी होता है। स्वच्छ उपकरणों का प्रयोग, सही लेबलिंग और नमूनों को छाया में सुखाकर प्रयोगशाला भेजना आवश्यक है। सही नमूना ही सही रिपोर्ट की कुंजी है, क्योंकि गलत नमूना किसानों को गलत उर्वरक सिफारिशों की ओर ले जा सकता है।

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मृदा परीक्षण किसानों के लिए केवल मिट्टी की जांच नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, लाभकारी और टिकाऊ खेती का आधार है।

मिट्टी की पीएच, लवणीयता, जैविक कार्बन तथा जलधारण क्षमता का आकलन कर क्षेत्र के लिए उपयुक्त फसलों और फसल चक्र का चयन किया जा सकता है। इससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित होता है, अनावश्यक कृषि खर्च कम होता है तथा उत्पादन लागत में कमी आती है। संतुलित पोषण प्रबंधन के परिणामस्वरूप फसलों की वृद्धि, उपज और गुणवत्ता में सुधार होता है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य और अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, मृदा परीक्षण मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने, संसाधनों के कुशल उपयोग तथा पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मृदा परीक्षण पर किया गया छोटा-सा निवेश किसानों को कई गुना आर्थिक लाभ प्रदान कर सकता है। इसलिए प्रत्येक किसान को मृदा परीक्षण कराकर “सही मिट्टी, सही पोषण और सही फसल” के सिद्धांत को अपनाना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ मिट्टी ही अधिक उत्पादन, अधिक आय, टिकाऊ कृषि और समृद्ध किसान की आधारशिला है।

आज भी अनेक किसान फसलों की पोषण आवश्यकता को केवल यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों तक ही सीमित मानते हैं, जबकि अच्छी उपज और गुणवत्ता के लिए सभी पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन आवश्यक है। जिंक, बोरॉन, आयरन, सल्फर और मैंगनीज जैसे तत्व फसलों की वृद्धि, दाना भराव, गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा उत्पादन स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केवल यूरिया के अधिक उपयोग से मिट्टी में पोषण असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए मृदा परीक्षण के आधार पर सभी आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग ही स्वस्थ मिट्टी, बेहतर फसल और अधिक लाभ का आधार है।

कृषि वैज्ञानिक समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं, जिसमें रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेष, जैव उर्वरक और फसल चक्र को शामिल किया जाता है। यह प्रणाली मिट्टी की संरचना सुधारती है, जैविक कार्बन बढ़ाती है, जल धारण क्षमता मजबूत करती है और खेती को अधिक टिकाऊ बनाती है।

भारत सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके माध्यम से किसानों को उनकी मिट्टी की पोषक स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक उर्वरक सिफारिशें उपलब्ध कराई जाती हैं। किसान मृदा परीक्षण एवं वैज्ञानिक परामर्श के लिए मृदा परीक्षण प्रयोगशाला, कृषि विज्ञान संकाय, एस.जी.टी. विश्वविद्यालय, गुरुग्राम का लाभ उठा सकते हैं। यहां मिट्टी की वैज्ञानिक जांच के आधार पर फसलवार पोषक तत्व एवं उर्वरक प्रबंधन संबंधी सटीक सिफारिशें प्रदान की जाती हैं, जिससे उत्पादन लागत कम करने, फसल उत्पादकता बढ़ाने तथा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता मिलती है। मिट्टी केवल भूमि नहीं, बल्कि कृषि समृद्धि की जीवनरेखा है।

Khabar Abtak

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