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शेर-ए-हिंद सुंदर मुनि की दीक्षा की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में गोहाना के टी. पी. एस. में 5 को होगा भव्य समारोह

मां की मन्नत पूरी करने के लिए जैन संत बन गए शेर-ए-हिंद

 

गोहाना :-25 नवम्बर : जैन समाज वजीरपुर स्थित टी.पी.एस. पब्लिक स्कूल में 5 दिसंबर को भव्य आयोजन करने की तैयारी में जुट गया है। यह उत्सव शेर-ए-हिंद सुंदर मुनि की दीक्षा की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में होगा। इसी तारीख को 1973 में सुंदर मुनि अपनी मां की मन्नत को पूरा करने के लिए जैन संत बन गए थे।

सुंदर मुनि उसी रिंढाणा गांव में जन्मे जहां के इंदुराज नरवाल वर्तमान में बरोदा हलके के विधायक हैं। शेर-ए-हिंद के खिताब से अलंकृत सुंदर मुनि नरवाल जाट परिवार के पांच बेटों में से सबसे छोटे हैं। उनके पिता माई राम और मां भरपाई देवी थे। 5 दिसंबर 1973 को जब सुंदर मुनि को सुदर्शन लाल जी महाराज ने सुमति मुनि संग दीक्षित किया था, उस समय उनकी आयु केवल 15 साल की थी। तब उन्होंने आठवीं कक्षा की नौमाही परीक्षाएं दी थीं। सुंदर मुनि का परिवार जैन धर्म की ओर आकृष्ट कैसे हुआ, वह अत्यन्त रोचक और चमत्कारी है। रिंढाणा गांव में सुंदर मुनि के दादा की बहन की बारात आई थी। तब बारातें अब की तरह से नहीं आती थीं बल्कि चार-चार दिन ठहरती थीं। वर पक्ष ने जितने बाराती सूचित किए थे, उसे दो गुणा बाराती आ गए तो हाथ-पांव फूल गए। उस समय जैन संत छोटे लाल और माया राम परिभ्रमण करते हुए रिंढाणा गांव में आए हुए थे। नरवाल परिवार ने अपनी दुविधा से जैन संतो को अवगत करवाया, उन्होंने आशीर्वाद देने मैं कोई विलंब नहीं किया। उपलब्ध संसाधनों में ही विवाह अच्छी तरह से निपटने ने पूरे रिंढाणा गांव को जैन धर्म का दीवाना बना दिया।

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इसी तरह से जैन संत मदन लाल रिंढाणा गांव में आए हुए थे। उनके दर्शन कर सुंदर मुनि जी मां भरपाई देवी मंत्रमुग्ध हो गई। उन्होंने निश्चय किया कि अगर उनके एक से ज्यादा बेटे हुए तो वह एक बेटे को जैन संत अवश्य बनाएंगी। भगवत अनुकंपा ऐसी हुई कि माई राम और भरपाई देवी के पांच-पांच बेटे हो गए। सुंदर मुनि पांच भाइयों में सबसे छोटे हैं। उनके सबसे बड़े भाई मास्टर इंद्र सिंह नरवाल इस समय 84 साल के हैं। मां की मन्नत की जानकारी मिलने पर सुंदर मुनि ने तय किया कि वह जैन संत बनेंगे। 1971 में वैराग्य धारण किया। दो साल वैरागी रहने के बाद आखिर वह दिन आ ही गया जब उन्हें दीक्षित कर दिया गया।

सुंदर मुनि की जैन संत बनने से भी अधिक रोचक उनके बड़े भाई स्व. राम कुमार जैन के पोते के जन्म के एक घंटे के भीतर जैन चरणों में समर्पित हो जाना है। राम कुमार जैन भी चाहते थे कि उनके दो बेटे हुए तो एक बेटे को जैन संत अवश्य बनाएंगे। लेकिन प्रकृति ने केवल उन्हें एक बेटा हरिओम दिया। राम कुमार नहीं रहे, पर हरिओम ने पिता का संकल्प अधूरा नहीं रहने दिया। गोहाना शहर में हुई प्रसूति में जब हरि ओम की पत्नी ने बेटे को जन्म दिया, पूरा परिवार जन्म के एक घंटे में उस नवजात शिशु को ले कर गुरु चरणों में उपस्थित हो गया। परिवार ने गच्छाधिपति प्रकाश चंद जी महाराज की झोली में वह शिशु डाल दिया। उस शिशु का नामकरण श्रेष्ठ सुंदर किया गया जिसका पालन-पोषण सिंगल मदर प्रतिभा जैन कर रही हैं। वह टी.पी.एस. पब्लिक स्कूल की एम. डी . हैं। श्रेष्ठ सुंदर प्रतिभा का दूसरा दत्तक बच्चा है। इससे पहले प्रतिभा जैन ने बेटी के रूप में यशी को गोद लेते हुए उसे अपना नाम दिया था । यशी का पूरा नाम यशी प्रतिभा जैन है।

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