नगर परिषद ने छोटे पशु 400 तो बड़े पशु 900 रुपए में पकड़ने का दिया टेंडर, पर गौशालाओं का असहयोग बना बाधक
गौशालाओं का रवैया मायूस करने वाला है। अगर गौशालाएं पकड़े जाने वाले गौवंश को लेने के लिए तैयार हो जाएं, गोहाना दो दिन में स्ट्रे कैटल फ्री सिटी बन जाए। रजनी इंद्रजीत विरमानी, चेयरपर्सन, नगर परिषद
गोहाना :- गलियों और सड़कों पर खुले घूम रहा गौ वंश रोज नित नए हादसों को अंजाम दे रहा है। नगरे परिषद ऐसे पशुओं को पकड़ने के लिए टेंडर भी कर चुकी है। लेकिन दिक्कत यह है कि पकड़े जाने वाले पशुओं को छोड़ा कहां जाए। गौशालाएं ऐसे गाय – नंदी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। नगर परिषद के EO ही नहीं, स्वयं SDM भी अनेक बार बैठक बुला चुके हैं, लेकिन हर बैठक में गौशालाओं के संचालक साफ इंकार कर देते हैं।
नगर परिषद ने गौवंश को पकड़ने के लिए टेंडर दे रखा है। यह टेंडर प्रत्येक छोटे पश के लिए 400 रुपए तो बड़े
पशु के लिए 900 रुपए का है। लेकिन नगर परिषद जिस समस्या से जूझ रही है, उसका समाधान सरल नहीं हैं। जो भी गौवंश पकड़ा जाए, उनके लिए सबसे सुरक्षित ठौर गौशालाएं हैं। गौशालाएं जनता के चंदे से चलती हैं और जनता ही है जो गौवंश के सीधे निशाने पर है।लेकिन गौशालाएं पकड़े जाने वाले गौवंश को ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि प्रशासन ने गौशालाओं को मनाने
का प्रयास नहीं किया, लेकिन गौशालाएं हैं कि टस से मस होने के लिए राजी नहीं हैं। नगर परिषद के EO कई बार गौशालाओं के संचालकों की बैठकें बुला चुके हैं। उनसे बात नहीं बनी तो कमान SDM ने अपने हाथ में ली। लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात रहा। नगर परिषद पेशकश कर चुकी है कि वह पकड़े गए प्रत्येक गौवंश के लिए गौशालाओं को प्रतिदिन के चारे के 50
रुपए देगी। लेकिन गौशालाओं का आरोप है कि नगर परिषद कहती भर है, लेकिन अपने इस वायदे पर खरी नहीं उतरती ।गौशालाओं के इंकार की पृष्ठभूमि में दो कारण हैं।पहला कारण है उनके पास स्थानाभाव। कोई गौशाला शहरी है या ग्रामीण, उसके पास इतना स्थान नहीं है कि वह पकड़े जाने वाले तमाम गौवंश को पालने की हामी भर सकें। दूसरा कारण है कि गौवंश पर होने वाला खर्च ।
गौशालाओं का कहना है कि उन्हें जो सरकारी मदद या जनता से चंदा मिलता है, उससे गौशालाओं की गायों का खर्च ही बड़ी मुश्किल से पूरा होता है। नगर परिषद ने रोहतक रोड पर बाईपास पर एक नंदीशाला विशेष रूप से इसी प्रयोजन से बनाई कि वहां शहर से पकड़े जाने वाले गौवंश को छुड़वा दिया जाए। लेकिन उस नंदीशाला में भी जल्दी जगह की कमी परेशान करने लगी। इधर हल होने में हो रही देरी आम जनता पर सीधे तौर से भारी पड़ रही है। आपस में दिनभर गुत्थमगुत्था रहने वाला गौवंश कब आपस में लड़ते-लड़ते वहां से गुजर रहे किसी पैदल नागरिक या दोपहिया वाहन का काल बन जाए,तय नहीं हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता होगा जब शहर के किसी न किसी हिस्से में कोई हादसा न होता हो । नगर परिषद की भी इच्छा है कि इस सिलसिले पर ब्रेक लगे, लेकिन समाधान की दिल्ली कोसों दूर प्रतीत हो रही है।
हमारी क्षमता थी 100 की, हमने 150 गौवंश
स्वीकार कर लिए। हमें वायदा किया गया था खर्च देने
का। लेकिन एक पैसा भी न मिलने से आर्थिक बोझ भारी
हो गया।
सुमेर जैन, अध्यक्ष, श्रीनंदलाला गौधाम, गांव ठसका


