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बिहार की औरतों को क्यों दोष दिया जा रहा? 

 

डॉ तेजी ईशा, लेखिका एसजीटी यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग में विभागाध्यक्ष हैं

बिहार विधानसभा का रिजल्ट आया। रिजल्ट में एनडीए को बहुमत मिला, फिर से नीतीश सरकार के बनने का रास्ता साफ हुआ। ये फैसला बिहार की जनता का था। स्त्री-पुरुष दोनों मतदाताओं का था। अगर बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम देखेंगे तो सत्ता पक्ष के सामने विपक्ष कहीं टिका ही नहीं। एक तरफा चुनाव था, ये परिणाम से साफ हुआ। इस बार महिला मतदाताओं ने बढ़चढ़ कर वोट किया। बिहार में महिला मतदाताओं का वोट प्रतिशत पहली बार ही नहीं बढ़ा है। वर्ष 2005 के बाद से हर चुनाव में महिलाओं ने वोटिंग में आगे बढ़ के हिस्सा लिया है। इस मामले में कोरोना काल में हुए चुनाव अपवाद हो सकते हैं। फिर इस बार ऐसा क्या हो गया कि ज्यादा संख्या में वोट करने के लिए महिलाओं को लालची बताया जा रहा?

असल में चुनाव से ठीक पहले नीतीश सरकार ने मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत राज्य के उन महिलाओं के खाते में दस हजार रुपये डाले जो जीविका समूह से जुड़ी हुई थीं। विपक्षी नेताओं को, कई जानकारों को और कई विश्लेषकों को लगता है कि केवल इसी वजह से नीतीश सरकार या एनडीए को महिलाओं का वोट मिला। जबकि ये सरासर गलत बात है। आप कह सकते हैं कि इस योजना ने महिलाओं को सरकार के पक्ष में वोट करने का एक और कारण दे दिया लेकिन केवल दस हजार रुपए मिलने की वजह से महिलाओं ने वोट किया, ये गलत है। सरासर गलत है।

नीतीश कुमार जब पहली दफा राज्य के मुखिया बने, तभी से उन्होंने महिला मतदाताओं को ध्यान में रख ये योजनाएं चलाईं। 2008 में नीतीश कुमार ने हाई स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल दिलाई थी। देखते-देखते गांव-देहात की फिजां बदल गई थी। स्कूली ड्रेस पहने लड़कियां झुंड में साइकिल से स्कूल जाने लगीं। जब लड़कियां बाहर निकलीं तो कुछ शोहदे उनको परेशान करने लगे। नीतीश कुमार ने बिना ‘एनकाउंटर’ किए लड़कियों को भरोसा दिलाया कि अगर उन्हें कोई परेशान करेगा तो पुलिस उसका इलाज करेगी। फिर पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण। बिहार पुलिस में लड़कियों के लिए आरक्षण का इंतजाम इस मुख्यमंत्री ने किया।

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शराब पीकर जब घर के मर्द नाटक करने लगे। घर की बेटी-पत्नी को मारने-पीटने लगे तो नीतीश ने शराबबंदी जैसा सख्त कदम उठाया। राज्य सरकार को करोड़ों का नुकसान हुआ लेकिन उन्होंने वो फैसला वापिस नहीं लिया। इससे भी राज्य की महिलाओं में एक भरोसा जगा। और इन सभी वजहों से हर विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने नीतीश का समर्थन किया। कम या जायदा। इस चुनाव में तो एक नई पार्टी भी थी जो कह रही थी कि हम चुनाव जीते तो सबसे पहले शराबबंदी खत्म करेंगे। उस पार्टी और उस दल के मुखिया ने ये भी नहीं सोचा कि एक बार महिलाओं से राय ले लें। उनसे पूछ लें। समझ लें। इससे उलट नीतीश कुमार ने अपने पूरे टर्म में यानी बीस साल के शासनकाल में महिलाओं को आगे रखा। अपने शुरुआती समय में नियमित तौर से महिलाओं की पंचायतें बिठाते थे और उसमें खुद जाते थे। वहां घंटों बैठ के महिलाओं की बातें सुनते थे।

मेरे कहने का मतलब कि नीतीश सरकार ने अपनी शुरुआती दिनों से राज्य की महिलाओं को एक अलग वोट के तौर पर देखा है। उन्होंने लड़कियों को ‘जहां परिवार कहेगा वहीं वोट डालने की मशीन’ नहीं माना। और इस वजह से राज्य की महिलाएं हर चुनाव में नीतीश में अपना भरोसा जताती रहीं हैं। इसलिए ये कहना बंद कर देना चाहिए कि महिलाओं ने कुछ पैसे के लालच में अपना वोट बेच दिया। उन्होंने नीतीश को वोट दिया क्योंकि नीतीश ने उन्हें पुरुषों से अलग समझा। उनकी आवाज, उनकी जरूरतों को समझा, उनके मुताबिक सरकार के नियम बनाए। सरकारी योजनाओं में महिलाओं को उनका हिस्सा दिलवाया।

एक बार आखिर में कह दूं, अगर राज्य के नेता और विपक्षी पार्टियां ये मान के आज बैठ गईं कि नीतीश सरकार को महिलाओं ने वोट केवल दस हजार रुपये के चक्कर में दिया है तो यकीन मानिए, आज से पांच साल बाद होने वाले वाला चुनाव भी वो हार चुके हैं, क्योंकि इस चुनाव में उनकी हार के असल वजह वो खोज ही नहीं पाए। और अगर सही वजह ही नहीं खोज पाए तो उसे ठीक क्या खाक करेंगे!

 

 

लेखिका एसजीटी यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग में विभागाध्यक्ष हैं

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