- कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणाम हो या पंजाब में जालंधर लोकसभा का उपचुनाव दोनों के नतीजों ने जहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मजबूत किया है वही भारतीय जनता पार्टी बैकफुट पर नजर आई है। लेकिन अजब स्थिति यह है कि भाजपा के कमजोर होने की स्थिति में भी हरियाणा में जेजेपी की स्थिति मजबूत हुई है। मजबूत इसलिए कि भाजपा में उसकी जरूरत बढ़ गई है।इसका मुख्य कारण यह है कि जब भी कांग्रेस मजबूत होती है या बीजेपी में कमजोरी महसूस होती है तो भी जेजेपी में स्वाभाविक मजबूती देखने को मिलती है। जाहिर है अपना पक्ष मजबूत करने के लिए हरियाणा में बीजेपी के नेता जे जे पी के नेताओं के मुंह की और देखना शुरू कर देते हैं या ऐसा प्रतीत होने लगता है। जेजेपी की स्थिति यह है कि उसके नेता यह चाहते हैं कि उनका बीजेपी से साथ तालमेल मतलब गठबंधन बना रहे ।यह अलग बात है कि उनकी कोशिश यह भी रहती है कि बीजेपी के साथ छूट भी जाए तो वे चुनाव का मजबूती से सामना करने को तैयार रहें। इस समय भारतीय जनता पार्टी भी जेजेपी को साथ लेकर चलने की कोशिश में है भारतीय जनता पार्टी का अर्थ ओमप्रकाश धनखड़ या उसकी टीम नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह है और इन दोनों को इस समय राजस्थान में दिसंबर में होने वाले चुनाव नजर आ रहे हैं जहां जाट मतदाताओं को साधने के लिए उन्हें जेजेपी को एक जरिए के रूप में इस्तेमाल करना पड़ेगा। निश्चित तौर पर राजस्थान के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 15 से लेकर 20 सीटें जेजेपी के लिए छोड़ सकती है और जेजेपी के नेता भी इस तैयारी में लगे हुए हैं। यह अलग बात है कि उनकी मांग 28 सीटों की है।
राजस्थान के एक विधानसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल ने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे इनमें से 6 लोग विधायक बनने में सफल हुए थे और इन छह के सहयोग से ही भारतीय जनता पार्टी के भैरों सिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन पाए थे। मतलब यह है कि राजस्थान के चुनाव में भी भाजपा को जेजेपी की जरूरत है और जेजेपी को भाजपा की ।उसके बाद लोकसभा के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की कोशिश यही रहेगी कि जेजेपी उनके सहयोगी दल के रूप में चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों का साथ दें ।यहां एक सवाल यह है कि लोकसभा के चुनाव में भाजपा के नेता कोई सीट जेजेपी के लिए छोड़ेंगे या फिर विधानसभा में सिटी बांटने की बात कहकर मामले को निपटा लिया जाएगा। इस संदर्भ में एक चर्चा आम है कि जेजेपी के नेता लोकसभा के चुनाव में 10 में से 2 सीटें अपने लिए चाहते हैं। जेजेपी के नेता दो नहीं तो 1 सीट दिग्विजय सिंह चौटाला के लिए भिवानी महेंद्रगढ़ जरूर चाहेंगे ।अब देखना यह है कि अंतिम फैसला क्या होगा। यदि जेजेपी की चुनाव की तैयारियों की बात करें तो एक बात और सामने आ रही है वह है पार्टी के पुनर्गठन की ।जेजेपी में एक चर्चा आम थी कि पार्टी में कुछ जिला अध्यक्ष कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहे हैं उन्हें बदले जाने की मांग खुलकर तो नहीं लेकिन अंदर खाने हो रही थी ।अब जेजेपी ने जिले में मजबूत अध्यक्ष कुछ इस दृष्टिकोण के तहत बनाए हैं कि जिले में उनका प्रत्यक्ष दबदबा रहे और समय आने पर उन्हें चुनाव में भी उतारा जा सके। जेजेपी ने जहां पहले शहरी और ग्रामीण नाम से हर जिले में दो जिलाध्यक्ष बना रखे थे अब एक एक प्रधान बना दिया है। अब जेजेपी के जितने जिलाध्यक्ष हैं सारे मजबूत और साधन संपन्न हैं। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि संगठन और हैसियत की दृष्टि से जेजेपी व्यवहार में मजबूती की ओर अग्रसर नजर आ रही है।
आम आदमी पार्टी की मजबूती की बात करें तो हमें यह मानना पड़ेगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार की पंजाब की परफॉर्मेंस का हरियाणा की राजनीति पर सीधा असर देखने को मिलता है । पंजाब में उपचुनाव की जीत के बाद हरियाणा में आम आदमी पार्टी में इतनी मजबूती जरूर आई है कि नेताओं के पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में शामिल होने के रुझान में रोक लग जाएगी।आम आदमी पार्टी के कई पूर्व विधायक पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं कुछ और भी पार्टी छोड़ने की तैयारी में बताए गए थे । यदि पंजाब में जालंधर उपचुनाव में भी आम आदमी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ जाता तो दो-तीन बड़े नेता आम आदमी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा कर चुके होते। आम आदमी पार्टी की तीन कमजोरियां लोगों के सामने आ रही हैं एक यह कि दिल्ली में बैठे नेताओ के पास काम करने वाले अपने विश्वास के नेताओं और कार्यकर्ताओं का अभाव है और यही नेता प्रदेश के नव आगंतुकों पर भरोसा नहीं करते। पार्टी के नेता नए लोगों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं लेकिन नए लोग अरविंद केजरीवाल से सीधा संपर्क चाहते हैं और यह संपर्क या तो कराया नहीं जा रहा या फिर किसी कारण से हो नहीं पा रहा। तीसरा यह कि आम आदमी पार्टी के पास गठबंधन करने के लिए कोई व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं है। कुछ कारण ऐसे भी हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उलझे हुए से नजर आ रहे हैं और वह हरियाणा के लिए कोई वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की हरियाणा में एक सांझी समस्या पार्टी के पुनर्गठन की है। कांग्रेस 8 साल से पार्टी का पुनर्गठन नहीं कर पाई है उधर आम आदमी पार्टी ने एक बार बने अपने संगठन को भंग कर दिया परंतु अब नया संगठन बनाया नहीं जा रहा है।
कर्नाटक के चुनाव में शानदार जीत के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और उसके शुभचिंतकों में उत्साह का संचार है ।कांग्रेस के पक्ष में पहले ही माहौल बना हुआ है जो अब और बढ़ सकता है। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से हरियाणा का कनेक्शन सर्वविदित है क्योंकि हरियाणा के कांग्रेस के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला कर्नाटक में कांग्रेस के महासचिव प्रभारी के रूप में काम कर रहे हैं। जीत ने उनकी साख बढ़ाने का काम किया है। अब रणदीप सिंह सुरजेवाला और अधिक ऊर्जा के साथ हरियाणा में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा सकते हैं इससे भी कांग्रेस मजबूत होगी। लेकिन एक बात और चर्चा करने की यह है कि हरियाणा की एक और कांग्रेस की महासचिव कुमारी सेलजा के सामने भी खुद को साबित करने का मौका है पार्टी ने उन्हें प्रभारी के रूप में उस छत्तीसगढ़ राज्य में काम करने का अवसर प्रदान किया जहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में है। लोग यहां तक कहते हैं कि पिछले लोकसभा के चुनाव में जहां भाजपा ने छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी वही कुमारी शैलजा के नेतृत्व में अगले लोकसभा के चुनाव में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की तरह कांग्रेस से सभी 11 सीटें जीतने की स्थिति में आ रही है ।यदि ऐसा हुआ तो कुमारी शैलजा को भी पार्टी में अपेक्षा से ज्यादा अहमियत मिलेगी और बे भी अपने प्रभाव को का इस्तेमाल हरियाणा में लोकसभा तथा विधानसभा दोनों चुनाव में दिखाने की कोशिश करेंगी।
कर्नाटक और पंजाब के चुनाव परिणाम आने के बाद निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी बैकफुट पर नजर आने लगी है। इसका असर हरियाणा में भी देखने को मिल रहा है और लोग आमतौर पर यह चर्चा करने लगे हैं कि हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की डगर आसान नहीं रही है। हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी के संगठन की बागडोर जिस नेता ओमप्रकाश धनखड़ के हाथ में है उनका प्रदेश में कहीं भी मजबूत जनाधार नहीं है ।वह मंत्री रहते 2019 का चुनाव हार गए और उनकी अगली डगर भी आसान नहीं है बल्कि कुछ लोग तो शर्त लगाकर यह दावा करते देखे जा सकते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ अगला चुनाव भी नहीं जीत पाएंगे ।जब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर प्रदेश में यह राय बनी हुई है तो फिर भाजपा की स्थिति का आकलन भी आसानी से किया जा सकता है। जानकार तो यह कहने लगे हैं कि अपनी कमजोरी के कारण भारतीय जनता पार्टी के नेता कथित तौर पर इस योजना पर काम कर रहे हैं कि अंबाला में सांसद के निधन के बाद खाली हुई सीट पर उपचुनाव ना कराया जाए क्योंकि पार्टी को लेकर जैसी स्थिति है उसे देखते हुए नेता कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं है क्योंकि यह रिस्क खतरनाक साबित हो सकता है ।जाहिर है उपचुनाव नहीं हुआ तो भी इसे भाजपा की कमजोरी के रूप में देखा जाएगा। भारतीय जनता पार्टी 2024 के लोकसभा के चुनाव तक खुद को कितना परफॉर्म कर पाएगी यह देखने वाली बात है ।लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं की लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव हरियाणा में मुकाबले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में ही होंगे।
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