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गढ़ी सराय नामदार खां गांव में दिवाकर भारती 11 दिन की ‘भू-समाधि से सुरक्षित आए बाहर ; तपस्या पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में महाशिवरात्रि पर हुआ भंडारा

 

गोहाना :-9 मार्च: मकर संक्रांति पर हरिद्वार के निरंजनी अखाड़े में दीक्षा ग्रहण करने वाले नागा साधु दिवाकर भारती 11 दिन से भू-समाधि में लीन थे। उनकी तपस्या पूर्ण सुरक्षित रही। शनिवार को गढ़ी सराय नामदार खां में स्थित संन्यास आश्रम में उनकी साधना पूर्ण होने और महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में खुले भंडारे का आयोजन किया गया। नागा साधु को आशीर्वाद देने के लिए उनके गुरु और अखाड़े के श्री महंत राजेंद्र भारती भी पहुंचे।

दिवाकर भारती मूलत: उड़ीसा के हैं। उन्हें नहीं मालूम कि उनके माता-पिता कौन हैं, उनके कितने भाई-बहन हैं। उन्हें वाराणसी स्थित कांशी विश्वनाथ धाम में परिपक्व होने पर इतना भर बताया गया कि जब वह केवल
तीन बरस के थे, उनके माता-पिता उनको धाम को दान कर गए थे।

दिवाकर भारती ने कभी भी औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की। जो सीखा, गुरुकुलों से सीखा। वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिए परिभ्रमण में व्यस्त रहे। इस समय उनकी आयु 32 वर्ष है। उन्होंने 14 जनवरी को हरिद्वार में नागा साधु की दीक्षा ग्रहण की। इसी दीक्षा के बाद उन्होंने अपने साधु जीवन की सर्वप्रथम तपस्या गढ़ी सराय नामदार खां गांव स्थित संन्यास आश्रम में की। तपस्या से तीन दिन पहले उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया। पूर्णिमा के दिन जब उन्होंने भू-समाधि में प्रवेश किया, तब उनका पूरा धड़ जमीन के अंदर और केवल गर्दन चेहरा भूमि से ऊपर थे।

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साथ में दिवाकर भारती ने मौन व्रत भी धारण कर रखा था। 11 दिन की साधना पूर्ण होने पर जब वह समाधि से बाहर आए, तब उन्होंने बताया कि वह भगवत भक्ति में इतने तन्मय थे कि बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कटे हुए थे। न कभी भूख लगी, न प्यास ने सताया। न
शौच की इच्छा हुई, न पेशाब की तलब ने आहत किया।

कृशकाय दिवाकर भारती के चेहरे का तेज देखते ही बनता है। भू-समाधि में पूरी तरह से निराहार रहने के बावजूद उन्हें कोई कमजोरी महसूस नहीं हो रही है। उनका कहना है कि भक्ति की शक्ति का चमत्कार है। कि वह पहले से ज्यादा हृष्ट-पुष्ट हैं तथा उनको अपने में नई ऊर्जा का संचार अनुभव हो रहा है।

दिवाकर भारती को आशीर्वाद देने के लिए हरिद्वार के निरंजनी अखाड़े के श्रीमहंत और उनके गुरु राजेंद्र भारती भी पहुंचे। जब दिवाकर भारती समाधि में थे, तब भी उनका कुशल क्षेम जानने के लिए राजेंद्र भारत आए थे। दिवाकर ने कहा अपने गुरु और धरती मां के आशीष से ही उन्होंने कठोर साधना सहजता से पूर्ण की।

भंडारे में प्रसाद ग्रहण करने के लिए सुभाष शर्मा, जसबीर लठवाल, आजाद सिंह दांगी, मलिक राज मलिक, डॉ. सुरेश सेतिया, मदन लाल अत्री आदि भी पहुंचे।

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