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किसानों को रासायनिक खाद संकट से बचा सकते हैं जैविक स्रोत : डॉ. शक्ति ओम पाठक

धान बुआई का सीजन सिर पर, वर्मी कंपोस्ट, गोबर की खाद को न भूलें 

गुरुग्राम, (अनिल जिंदल) 16 अगस्त। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक डॉ शक्ति ओम पाठक का कहना है कि

वर्तमान समय में विश्व स्तर पर उत्पन्न भू-राजनीतिक परिस्थितियों, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव तथा ईरान–अमेरिका संघर्ष जैसी घटनाओं के कारण ऊर्जा एवं उर्वरक उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। देश इस समय गंभीर रासायनिक उर्वरक संकट से जूझ रहा है।

डॉ शक्ति ओम पाठक, जो एसजीटी, गुरुग्राम में सहायक प्रोफेसर हैं, ने सलाह दी है कि

इस परिस्थिति में किसानों के लिए आवश्यक है कि वे केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक एवं स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करें।

डॉ शक्ति ओम पाठक एसजीटी यूनिवर्सिटी में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला के इंचार्ज भी हैं। उन्होंने बताया कि धान भारत की प्रमुख फसल है तथा इसकी खेती में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है। यदि जैविक स्रोतों का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जाए तो रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता 25–50 प्रतिशत तक कम की जा सकती है तथा मृदा की उर्वरता और उत्पादन क्षमता भी लंबे समय तक बनी रहती है।

1. कम्पोस्ट:

कम्पोस्ट खेतों एवं घरों से प्राप्त जैविक अवशेषों के नियंत्रित अपघटन से तैयार की जाने वाली जैविक खाद है। इसमें लगभग 0.5–1.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.4–0.8 प्रतिशत फॉस्फोरस तथा 0.5–1.2 प्रतिशत पोटाश उपलब्ध होती है। धान की रोपाई से 15–20 दिन पूर्व 5–10 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह सड़ी हुई कम्पोस्ट मिट्टी में मिला देने से मृदा की संरचना में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है तथा पौधों को पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते रहते हैं। कम्पोस्ट मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या भी बढ़ाती है, जिससे पोषक तत्वों का खनिजीकरण तेज होता है।

2. वर्मी कम्पोस्ट :

वर्मी कम्पोस्ट केंचुओं द्वारा तैयार की गई अत्यंत गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद है। इसमें सामान्य कम्पोस्ट की अपेक्षा अधिक मात्रा में नाइट्रोजन (1.5–2.0%), फॉस्फोरस (1.0–1.5%) तथा पोटाश (1.2–2.0%) उपलब्ध रहती है। धान की खेती में 2–3 टन प्रति हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करने से पौधों की वृद्धि तेज होती है, जड़ों का विकास अच्छा होता है तथा रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है। वर्मी कम्पोस्ट में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीव पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं।

3. हरी खाद:

हरी खाद रासायनिक उर्वरकों का सबसे प्रभावी विकल्प मानी जाती है। इसके लिए ढैंचा, सनई, मूंग या लोबिया जैसी दलहनी फसलों की बुवाई करके 45–50 दिन बाद उन्हें खेत में पलट दिया जाता है। हरी खाद से लगभग 40–60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर भूमि में जुड़ सकती है, जिससे धान की नाइट्रोजन की आवश्यकता का बड़ा भाग पूरा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ता है, सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं तथा फॉस्फोरस एवं अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है।

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4. फसल अवशेषों का उपयोग

डॉ शक्ति ओम पाठक के अनुसार धान एवं गेहूं के अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में मिलाकर उनका अपघटन कराया जाए तो वे उत्कृष्ट जैविक खाद का कार्य करते हैं। अवशेषों के साथ जैविक अपघटक का प्रयोग करने से उनका विघटन शीघ्र होता है। इससे कार्बनिक पदार्थ बढ़ता है, मृदा की संरचना सुधरती है तथा दीर्घकाल में रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।

5. गोबर की सड़ी हुई खाद :

डॉ शक्ति ओम पाठक के अनुसार अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद भारतीय कृषि की सबसे पुरानी एवं विश्वसनीय जैविक खाद है। इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश के साथ-साथ अनेक सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। धान की खेती में 10–15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद का उपयोग करने से मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। यह उर्वरकों की उपयोग दक्षता भी बढ़ाती है।

6. जैव उर्वरक:

जैव उर्वरक ऐसे लाभकारी सूक्ष्मजीव हैं जो पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायता करते हैं। धान की खेती में विशेष रूप से निम्न जैव उर्वरकों का प्रयोग लाभकारी है

– एजोस्पिरिलम

– एजोटोबैक्टर

– ब्लू ग्रीन एल्गी

– एजोला

– फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु

इनके प्रयोग से लगभग 20–30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की बचत की जा सकती है तथा फॉस्फोरस की उपलब्धता भी बढ़ जाती है।

7. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन:

वर्तमान परिस्थितियों में केवल जैविक अथवा केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना उचित नहीं है। सबसे बेहतर उपाय एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन है।

यदि किसान निम्नलिखित संयोजन अपनाते हैं, तो उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त हो सकते हैं—

– 50–75% अनुशंसित रासायनिक उर्वरक

– 5–10 टन कम्पोस्ट या गोबर की खाद

– 2–3 टन वर्मी कम्पोस्ट (उपलब्धता अनुसार)

– हरी खाद का प्रयोग

– जैव उर्वरकों का उपयोग

इस प्रकार की प्रणाली से धान का उत्पादन स्थिर रहता है तथा रासायनिक उर्वरकों की बचत होती है।

डॉ शक्ति ओम पाठक ने धान किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं –

• मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें।

•खेत में उपलब्ध जैविक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करें।

• धान की रोपाई से पहले हरी खाद अवश्य अपनाएं।

• गोबर की केवल अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का ही उपयोग करें।

•वर्मी कम्पोस्ट एवं जैव उर्वरकों को नियमित रूप से अपनाएं।

• फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में मिलाएं।

• संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाकर लागत कम करें तथा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखें।

Khabar Abtak

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